Sunday, July 27, 2008

सूखे पत्तों सी है ज़िन्दगी !!!


पतझड़ में जब मैंने अपने ,

पच्चीस साल पुरे किये ,

तब टहनियों से टूट के ज़मी पर आया ,

आते ही सामना हवाओं से हुआ

खूब थपेड़े खाए , जिधर उसने चाह बस चल दिए

फ़िर धीरे से बारिश की बुँदे पड़ी

उसने थोड़ा सा सुकून पहुँचाया ,

भिगो करके उसने दी मुझको रहत

सोंधी सोंधी मिट्टी से मुझको मिलाया ,

मैं महकता रहा नई ताज़गी से

सभी को मैं बड़ा रास आया ,
फ़िर सूरज की किरणे जब मुझपर पड़ी

ख़ुद को नहीं मैं उस से बचा पाया ,

उम्र जो मेरी कम को रही थी

सूरज की जलन मैं नहीं सह पाया , जाने का वक्त अब आ ही रहा था

मैं धीरे से खामोशी के साथ हो गया ,

मिल गया मैं जाके फ़िर उसी कुदरत में

जिसने कभी मुझे पैदा किया था ,

मैं ज़मी के अन्दर से दुआ करता रहा

सारा जहाँ फ़िर से रौशन हो गया ,

2 टिप्पणियाँ:

परमजीत बाली on July 27, 2008 at 5:04 AM said...

सूखे पत्ते से जिन्दगी को बखूबी पेश किया है।बढिया लिखा है।

मैं धीरे से खामोशी के साथ हो गया ,

मिल गया मैं जाके फ़िर उसी कुदरत में

जिसने कभी मुझे पैदा किया था ,

मैं ज़मी के अन्दर से दुआ करता रहा

सारा जहाँ फ़िर से रौशन हो गया ,

राज भाटिय़ा on July 27, 2008 at 7:54 AM said...

बहुत प्यार से पढी आप की कविता,कई बार पढी धन्यवाद

 

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