Thursday 15 September 2011
बेफिक्री की इजाज़त नहीं देता है वक्त...
वो रुकता नहीं है, ठहरता नहीं है, चाहे अच्छा हो या बुरा, “वक्त” गुज़र ही जाता है, ये भी मुमकिन है के कभी लौट कर भी आता है और वक्त अपने वक्त का हिसाब मांगता है, मैं कभी सोचता भी हूँ के थोड़ा रुक जाऊं, रुकुं भी न अगर तो थोड़ा आराम कर लूँ, खुशियाँ जो ज़माने भर की है उन खुशियों के साथ हो लूँ, कभी खुली आखों से उन लम्हों को जी लूँ जो कभी बंद आखों से देखीं थी, लेकिन डरता भी हूँ के ख्वाहिशों के इस समंदर में कहीं मैं डूब न जाऊं... शायद इसलिए बेफिक्री की इजाज़त नहीं देता है “वक्त”
Saturday 6 March 2010
Tuesday 16 February 2010
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