Monday, July 21, 2008

कानून के जानकारों मेरी आवाज़ सुनो...





वकील साहब ,


नमस्कार ........


बहुत समय से मेरे मन में देश के कानून को लेकर कई सरे सवाल दौड़ रहे है ,मैं ख़ुद से सवाल करते करते थक गया हूँ , लेकिन जवाब अब भी नहीं मिला है ,


क्या हमारे देश के कानून से बढ़कर भी कुछ है ???


इसमें तो कोई दो राय नहीं हो सकती है के हमारे देश का कानून लचर है धीमा है फैसलों में कई कई साल लग जाते है लेकिन फ़िर भी फैसले होते नहीं है ? देरी की वजह से साक्ष भी मिटते जाते है , आरोपियों को इसका फायदा भी मिल जाता है वो बच निकलते है ?


लेकिन हमारा कानून कहता है के भले ही १०० आरोपी छुट जायें लेकिन एक बेगुनाह को सज़ा नहीं होनी चाहिए , ये अच्छी बात है बेगुनाह को सज़ा ना हो , लेकिन मैंने जो अपने आस पास देखा है उसमें कई ऐसे मामलें है जिसमें बेगुनाह को आरोपी बना दिया जाता है , जेल में ठूस दिया जाता है , केस चलता रहता है , पेशी आती जाती रहती है , सालों बीत जाते है , अखबारों में खबरें आती रहती है फलां ने हत्या कर दी , बलात्कार कर दिया , पुलिस अपनी ब्रीफिंग में उसके ख़िलाफ़ पुरी कहानी छपवाती रहती है , कुल मिलकर उसकी चरित्र हत्या कर दी जाती है और वह बलात्कारी मानसिकता के सामने बेबस होता है , बेबस इंसान बेचारा क्या कर सकता है ? उसवक्त उसकी कोई सुनने वाला नहीं होता है , { हाल ही में आरुशी हत्याकांड में भी उनके पिता पर कुछ एस तरह के आरोप भी लगे थे }


लेकिन रहत की बात ये होती है की माननीय न्यालय उसे बा इज्ज़त बरी कर देता है , लेकिन क्या फ़िर वो अपनी पुरानी जिंदगी में वापस लौट सकता है ? क्या समाज उसे फ़िर से अपना लेता है ? क्या उसके अपने या उसके आसपास के लोग उसे स्वीकार कर लेते है ? क्या उसकी खोई हुई इज्ज़त वापस आ जाती है { कोर्ट के इस फैसले से क्या इज्ज़त बरी किया जाता है } नहीं साहब नहीं आती है , समाज उसे दुबारा स्वीकार नहीं करता है , उसपर लगा कलंक सारी जिंदगी उसके साथ रहता है , और उसके जीवन को नर्क बना देता है , वो किसी को मुह दिखाने के लायक नहीं रहता है ,
अब वो क्या करे? उसके साथ जो बीता है उसका दोषी कौन है ? अदालत या समाज ? क्या समाज अदालत से बड़ा है ? जो उसे स्वीकार नहीं करता या अदालत के फैसले को नहीं मानता ?या फिर के पुलिस ? जिसने उसका चरित्र हनन किया है ? या के वो पत्रकार या अखबार जिसने ये सब छापा है ? क्यूँ के अदालत से बा इज्ज़त बरी होने की खबर तो उसने नहीं छापी ? दोषी चाहे कोई भी हो ये बात तो तय है की उसकी ज़िन्दगी तो बर्बाद हो गई !

ये हर उस आप आदमी की समस्या हो सकती है जिसने अपराध ना किया हो लेकिन इस तरह की सज़ा सारी ज़िन्दगी भुगत रहा हो ? मुझे जवाब चाहिए , सीधा सादा सा , बिना किसी दावं पेच के , क्या मेरी ज़िन्दगी मुझे वापस लौटा सकते हो ?

2 टिप्पणियाँ:

Anonymous said...

lagta hai dil ka darvaja kisi nay katkata diya hai /koi apna kisi jootay mukadmae may phas gaya hai /aap lagay raho hum sab satay huay logo ki dua aap kay blog kay dvara humari aawaz saydkisi ko suna day

दिनेशराय द्विवेदी on July 22, 2008 at 12:13 PM said...

"हमारे देश का कानून लचर है धीमा है फैसलों में कई कई साल लग जाते है लेकिन फ़िर भी फैसले होते नहीं है ? देरी की वजह से साक्ष भी मिटते जाते है , आरोपियों को इसका फायदा भी मिल जाता है वो बच निकलते है?"
इस का कारण कानून नहीं बल्कि सरकार द्वारा जरूरत की केवल 20 प्रतिशत अदालतें खोलना है।

जब गुनहगार छूट सकते हैं तो बेगुनाह भी चपेट में आ सकते हैं। उस का कारण बेगुनाह को उचित कानूनी सलाह नहीं मिलना और सबूत जुटाने के साधन नहीं जुटा पाना होता है। यह मौजूदा व्यवस्था की बड़ी खामी है जिसे तुरंत सुधारने की आवश्यकता है।
बाद में बाइज्जत छूटने का कारण उस के खिलाफ पर्याप्त सबूत न होना और सबूतों का फर्जी होना है।
अधिक जानकारी के लिए ब्लाग तीसरा खंबा के पूर्व आलेख पढ़ें।

 

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