Wednesday, September 3, 2008

आरज़ू ...



आसमां सी आरज़ू है ,
ख़ाब से हालात हैं !
जीने की है तमन्ना ,
थमी थमी सी सासं है !!
फिरता हूँ मैं दर बदर ,
मिलता नहीं है आसरा !
इस ज़मी पर आशियाने ,
की मुझे तलाश है !!
सारा शहर है बेरहम ,
कोई नहीं मेरा अपना !
काफ़िले में नज़रों को मेरी ,
मेरे अपनों की तलाश है !!
रात भर जागी है शायद ,
सुर्ख़ आखें कह रही है !
अश्क़ से भीगी हुई है ,
फ़िर भी इनमें आस है ,
रोज़ की तरहा इनमें ,
नई सुबह की तलाश है !!!

19 टिप्पणियाँ:

राज भाटिय़ा on September 3, 2008 at 12:58 PM said...

दुनिया की इस भीड मे हम सभी तन्हा हे.
धन्यवाद सुन्दर कविता के लिये

परमजीत बाली on September 3, 2008 at 1:02 PM said...

बहुत सुन्दर कविता है।बहुत बढिया कहा है-

रात भर जागी है शायद ,
सुर्ख़ आखें कह रही है !
अश्क़ से भीगी हुई है ,
फ़िर भी इनमें आस है ,
रोज़ की तरहा इनमें ,
नई सुबह की तलाश है !!!

Hyderabadi on September 3, 2008 at 4:43 PM said...

वाह वाह बहुत खूब , निहायित बेहतरीन नज़्म है , दिल को छु लेने वाली

दिनेशराय द्विवेदी on September 3, 2008 at 6:10 PM said...

न समझि्ए तनहा
सदा हमारा साथ है।

Udan Tashtari on September 3, 2008 at 7:00 PM said...

५ दिन की लास वेगस और ग्रेन्ड केनियन की यात्रा के बाद आज ब्लॉगजगत में लौटा हूँ. मन प्रफुल्लित है और आपको पढ़ना सुखद. कल से नियमिल लेखन पठन का प्रयास करुँगा. सादर अभिवादन.

मीत on September 3, 2008 at 7:11 PM said...

रात भर जागी है शायद ,
सुर्ख़ आखें कह रही है !
अश्क़ से भीगी हुई है ,
फ़िर भी इनमें आस है ,

bahut khoob.

योगेन्द्र मौदगिल on September 3, 2008 at 7:28 PM said...

वाकई बढ़िया कवितासुंदर भाव लिये..
बधाई..

Anil Pusadkar on September 3, 2008 at 9:48 PM said...

anwar miya hum sach me tumhare sath the, hain, aur rahenge

अनुराग on September 4, 2008 at 12:00 AM said...

bahut khoob......

vinayprajapati on September 4, 2008 at 1:18 AM said...

क़ुरेशी भाई मज़ा आ गया, क्या लिखा है!

swati on September 6, 2008 at 9:15 PM said...

बहुत सुंदर लिखा है ..सादर अभिवादन

geet gazal ( गीत ग़ज़ल ) ) on September 8, 2008 at 4:02 AM said...

ask se 'dhudhla sa ask' tak ka safar to tay kiya . badhiya hai. ab age kya ? kya ab bhi apni baat par jame huye ho ?

विक्रांत बेशर्मा on September 9, 2008 at 9:09 AM said...

रात भर जागी है शायद ,
सुर्ख़ आखें कह रही है !
अश्क़ से भीगी हुई है ,
फ़िर भी इनमें आस है ,
रोज़ की तरहा इनमें ,
नई सुबह की तलाश है !!!


क्या बात है !!!!!!! बहुत ही अची नज़्म है !!!!!!!

महामंत्री-तस्लीम on September 11, 2008 at 3:27 AM said...

रात भर जागी है शायद ,
सुर्ख़ आखें कह रही है !
अश्क़ से भीगी हुई है ,
फ़िर भी इनमें आस है।

जीवन के कटु सत्य के बीच से भी आशा की एक किरण जगाती यह कविता।

राज भाटिय़ा on September 12, 2008 at 12:12 PM said...

रमजान की मुबारकवाद आप को ओर आप के सभी जानपहचान वालो को ओर आप के परिवार को

Sanjeet Tripathi on September 13, 2008 at 10:15 AM said...

क्या बात है!

पहली बार आना हुआ आपके ब्लॉग पर।
शुभकामनाएं।

Advocate Rashmi saurana on September 19, 2008 at 1:04 AM said...

आसमां सी आरज़ू है ,
ख़ाब से हालात हैं !
जीने की है तमन्ना ,
थमी थमी सी सासं है !!
vah kya baat hai. bhut badhiya. jari rhe.

sab kuch hanny- hanny on September 19, 2008 at 8:11 AM said...

सुर्ख़ आखें कह रही है !
अश्क़ से भीगी हुई है ,
फ़िर भी इनमें आस है ,
रोज़ की तरहा इनमें ,
नई सुबह की तलाश है !!!
talash mujhe v hai jab puri hogi to bataungi

SACHIN JAIN on September 21, 2008 at 7:42 AM said...

:) anawar ji achaa likha hai aapne bhi, aapne jo likha hao mere blog me comment us par main yahi kahunga ki main nirash nahi hoon but it is the talk with myself to understand me better,

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