Friday, May 22, 2020
Wednesday, May 13, 2020
Monday, May 11, 2020
Sunday, May 10, 2020
Tuesday, May 5, 2020
Thursday, September 15, 2011
बेफिक्री की इजाज़त नहीं देता है वक्त...
वो रुकता नहीं है, ठहरता नहीं है, चाहे अच्छा हो या बुरा, “वक्त” गुज़र ही जाता है, ये भी मुमकिन है के कभी लौट कर भी आता है और वक्त अपने वक्त का हिसाब मांगता है, मैं कभी सोचता भी हूँ के थोड़ा रुक जाऊं, रुकुं भी न अगर तो थोड़ा आराम कर लूँ, खुशियाँ जो ज़माने भर की है उन खुशियों के साथ हो लूँ, कभी खुली आखों से उन लम्हों को जी लूँ जो कभी बंद आखों से देखीं थी, लेकिन डरता भी हूँ के ख्वाहिशों के इस समंदर में कहीं मैं डूब न जाऊं... शायद इसलिए बेफिक्री की इजाज़त नहीं देता है “वक्त”
Saturday, March 6, 2010
Tuesday, February 16, 2010
Saturday, January 31, 2009
चलिए ...ज़मी पर ख़ुदा ढूँढ़ते है !!!
मैं... एक दिन कुछ अपनी ज़िन्दगी से परेशां ...अपनी किस्मत का हिसाब किताब कर रहा था , हज़ारो सवाल मेरे इर्द गिर्द घूम रहे थे और मुझे चिढ़ा रहे थे बार बार मुझसे ये कहते ...आख़िर मैं ही क्यूँ ? हमेशा मेरे साथ ही ऐसा क्यूँ होता है ? ये तकलीफें ये मुसीबते हमेशा मुझपर ही क्यूँ आती है ? इसी तरह के हज़ारो सवाल मेरी बेचेनियों को और भी बढ़ा रहे थे ,सवाल जो कभी थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे ?...और जवाब जो मुझसे कोसो दूर थे ...कहीं सुना था के ख़ुदा तो हर जगह है तो लगा के ज़मी पर ख़ुदा ढूँढ़ते है ....अभी बस चलना शुरू किया ही था के अचानक नज़र उस जगह पर पड़ी जहाँ कभी दोस्तों की महफिले सजा करती थी , उसी जगह एक दोस्त भी मिला मुसाफिरों की तरह ...मुलाकात बहुत दिनों के बाद थी शायद इसलिए मिलनसारी भी कुछ कम नहीं थी , मैंने उसका हाल चाल जाना और अपना भी बताया ...कुछ हालात मुनासिब नहीं है कुछ परेशां सा हूँ ...उसने सारी बातें सुनकर मुझसे कहा ...फिकर मत कर यार ...एक दिन सब ठीक हो जाएगा ...भगवन सब ठीक कर देगा ...उसके पास ना ही मेरे कोई सवालों का जवाब था और ना ही मेरी किसी परेशानियों का कोई हल ...लेकिन फ़िर भी उसकी बात मुझे सुकून पहुँचा रही थी ...शायद वो जो कह रहा है वैसा ही कुछ हो ?....थोड़ी सी उम्मीद लिए मैं अपनी अगली मंजिल की तरफ़ चल निकला ...
सफर तो लंबा था लेकिन परेशानियाँ भी साथ चल रही थी ...थोड़ी दूर तक चलने के बाद ,मेरी यामाहा ख़राब हो गई , कुछ दूर धक्का देने के बाद मुझे एक बोर्ड दिखा { सतपाल सर्विसिंग सेंटर } लिखा था ... हमारे यहाँ ॥होंडा यामाहा स्कूटर ठीक किया जाता है मैंने उसे परेशानी बताई और बाइक बनवा कर चल दिया ...धुप थोड़ी बढ़ रही थी ...गला भी सूख रहा था ...सड़क पर ही एक गन्ने के रस की दुकान थी { बजरंग गन्ना रस } एक गिलास पीने पर गले को बड़ा ही सुकून मिला ...लेकिन मैं थोड़ा जल्दी में था ...मैं वहां से चला गया ...जिस काम से आया हूँ वो तो अभी तक पुरा हुआ नहीं है ...चलूँ अपनी तलाश जारी रखूं ...
शाम होते होते मैं कुछ नाउमीद सा होने लगा , मैं जिसकी तलाश में निकला हूँ वो तो मुझे कहीं नहीं मिला ...सुबह से शाम होने को है , सवाल फ़िर से थे क्या मैं फिज़ूल महनत कर रहा हूँ कुछ नहीं मिलना जुलना है ...सड़क के पास अपनी बाइक खड़ा कर के बैठा रहा ...सड़क पर सनसनाती भागती गाडियां और हार्न की तेज़ आवाज़ ... थोड़ी देर बाद मैंने अपने दोस्तों से फ़ोन पर बात की और उन्हें अपने पास बुलाया ...शिव तो आ गया लेकिन खोमेंद्र को आने में वक्त लगा ॥उसे ऑफिस में कुछ ज़ियादा काम था ...मैं और शिव आपस में बात करते रहे ॥इसी बीच मैंने अपनी ऑफिस से जुड़े कुछ काम उसे बताये और उसने उसे मुस्कुराते हुए करने की बात कही ...मुझे थोड़ा का सूकु और मिला उनका जवाब सुनकर ...खोमेंद्र भी अपने काम से कुछ परेशान था वो मुझे अपनी परेशानियाँ बता रहा था ...मैंने उसे सब ठीक होने का भरोसा दिया और रात होने का हवाला देकर सब अपने अपने घर आ गए !
रात थोड़ी ज़ियादा होने की वजह से घर की लाइट बंद हो गई थी ॥मुझे लगा सब सो रहे है ...लेकिन ऐसा नहीं था मेरी आहट सुनकर अम्मी और अब्बू जाग गए शायद वो सोये ही नहीं थे ...वो मेरा इंतज़ार कर रहे थे ...मेरे कमरे में आकर अब्बू ने पुछा ...अनवर तू आ गया ..मैं ...हाँ ... तब ही अम्मी की आवाज़ आई ..खाना लिकाल दूँ ... मैं ..हाँ ...खाना खा लेने के बाद बिस्तर पर लेटे हुए सोचता रहा ...आख़िर ख़ुदा है कहाँ ? ....इस ज़मी पर उसके नाम कई है कोई ख़ुदा कहता है तो कोई भगवान् कोई रब ...तो कोई और कुछ कहता है लेकिन वो है कहाँ जिसे मैं दिन भर ढूँढता रहा वो इस ज़मीं पर है भी या नहीं ???....थोड़ी देर सोचने पर मुझे इसका जवाब मिल गया !!!
Monday, January 26, 2009
ज़िन्दगी ....

ज़िन्दगी शब्द ही अपने आप में बहुत प्रभावित करेने वाला शब्द है इसे जानने की कोशिश तो सभी ने की है लेकिन इसे समझना बड़ा ही कठिन है ?...इस सरल से शब्द के पीछे इंसान की सारी ज़िन्दगी के राज़ छुपे हुए होते है ...इंसान ज़िन्दगी से सब कुछ चाहता है ...हर छोटी बड़ी खुशी ...हज़ारों हसरतें लिए सब कुछ हासिल कर लेना चाहता है ...किसी को सारी कायनात तो किसी को छोटा सा आशियाना ...हर कोई अपनी ज़िन्दगी में खुशियों को तलाशता ...इंसान ...ये भूल जाता है जो उसके साथ है वो ही उसकी खुशियाँ है ...वो ढूँढ़ते रहता है...सारी ज़िन्दगी ...थोड़ा सा सुकूँ...किसी को मिलता है ...किसी को मिलता भी नहीं ......
हर सूरत के पीछे कितने ख़ाब है ...और उन्हें हकीक़त में लाने के लिए कितनी जद्दोजहद...हर लम्हा इसी बेकरारी के साथ गुज़र जाता है...कहीं पेशानियों में शिकन है ...तो कहीं चमकती आखों में सुनहरे ख़ाब ...लेकिन ख्वाइशें हर वक्त जिंदा रहती है ...इसी उम्मीद के साथ के कभी तो वो पुरीं होंगी ...ज़िन्दगी ने हमेशा सभी को कुछ तो दिया है ...किसी ने कुछ हासिल किया तो किसी ने खो दिया ....
उम्मीदों का सफर हमेशा ज़िन्दगी के साथ चलता रहता है ...वो कभी थमता नहीं ...थकता भी नहीं ....हाँ ...कभी कभी थोड़ा उदास कभी थोड़ा परेशान सा ज़रूर होता है लेकिन कभी हारता नहीं है ...कई मुश्किलें कई परेशानियों से गुज़रता है लेकिन ये सफर बदस्तूर चलता रहता है ...
ज़िन्दगी बड़ी दिलचस्प है ...किसी के लिए सब कुछ ...तो कहीं सिफ़र है ...कहीं खुशियाँ तो कहीं आसूं है ...कहीं दर्द है तो कहीं राहत भी है ...कई आरज़ू अपने पर फैलाये आसमां की बुलंदियों को छु लेना चाहती है तो कहीं छोटे से ख़ाब है कहीं छोटा सा आसमां ...ज़िन्दगी हर हाल में खुबसुरत है ....
Thursday, January 15, 2009
मुझे ख़बर नहीं ...

भारत में हुए २६/११ के आतंकी हमले के बाद मिले सबूत में पाकिस्तान का हाथ होने की पुष्ठी से भारत ने पाकिस्तान पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है , वहीं चौतरफा दबाव के चलते पाकिस्तान ने भी आतंकी संगठनो पर शीकंज़ा कसना शुरू कर दिया है ॥लेकिन मुझे ख़बर ही नहीं ...
देश और विदेश में छाई आर्थिक मंदी से निपटने के लिए सार्थक कदम उठाये जा रहे है , निजी कम्पनियाँ खर्च कम करने के लिए कास्ट कटिंग में लगी हुई है , हजारों नौकरियां जा रही है शेयर बाज़ार का हाल बेहाल है ...लेकिन मुझे ख़बर ही नहीं ...
देश की राजनीती में अमर सिंह जैसे नेताओं की दखलंदाज़ी बढ़ गई है लेंन देन और गठबंधन की राजनीती शुरू हो गई है बहन जी का जन्मदिन चंदे से मनाया जाता है चंदा ना मिलने मर जान से मार दिया जाता है ...फ़िर उसी लाश पर राजनीती की जाती है घपलों और घोटालों में बड़े बड़े नेता और मंत्री फेस हुए है केस चलता रहता है ...लेकिन मुझे ख़बर नहीं ...
पड़ोस के ही घर से एक महिला की आवाज़ आने लगी ...सुनो राशन की दुकान में { सरकारी } चांवल और शक्कर आ गई है याद से ला लेना ॥पता नहीं इस बार कैसा होगा पिछली बार तो बहुत कंकर थे ...और हाँ ...आते आते बच्चों की स्कूल की फीस भी दे आना ...मैं शाम को दूध वाली को पैसा दे आउंगी ..हे भगवान् ..पता नहीं ये काम वाली को क्या हुआ है दो दिनों से आ भी नहीं रही है ...इतना कुछ हो रहा है ...लेकिन...मुझे ख़बर नहीं ....
देश में कितने एसे बच्चे है जो बाल श्रमिक है जो स्कूल नहीं जाते , जिनका कोई सहारा नहीं है ...कितने एसे लोग है जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती है ...रात में भूखे सोते है ॥सोने के लिए भी जगह नहीं मिलती ...रोज़ जो ज़िन्दगी से लड़ते है ...कितने एसे है जो ट्रेन या बस के पीछे दौड़ते रहते है भागते रहते है ...किसी की नौकरी तो किसी को उसकी तलाश ...हर कोई परेशान सा है ...अपनी ही मजबूरियों से बंधा है ...लेकिन मुझे ख़बर नहीं ...
कितना बेबस है आज का इंसान ...सब कुछ देखता रहता है ॥सब जानता भी है ...लेकिन कुछ नहीं कहता ...ज़िन्दगी की इस उलझनों में फसा इंसान ...फसा ही रह जाता है ...कोई कोशिश करता है तो कोई करता भी नहीं ...बड़ा लाचार सा है ..ये वो इंसान है जिसे लोग आम इंसान कहते है ..वेसे तो ये आम इंसान भी बड़ा खास होता है लेकिन कभी कभी ...ये सब कुछ जानता है लेकिन कहता है ..मुझे ख़बर नहीं !!!
Tuesday, January 6, 2009
चहरा ..चहरे पर ...चहरा ...???

तेज़ी से भागती हुई ज़िन्दगी में न जाने कितने चहरे देखें होंगे ... सड़क पर ...चौक ..चौराहों पर ..या किसी बाज़ार पर ...हर चहरा जैसे कुछ कह रहा हो ...कोई अपना कोई अनजाना सा ...किसी चहरे पर खुशी ...तो किसी पर शिकन ...कुछ मजबूर ..तो कुछ लाचार ...कुछ दर्द को छुपाते हुए चहरे पर मुस्कान लिए ...तो कोई सच में खुशी का अहसास करते हुए ...कितने चहरे ...कुछ याद है कुछ भूल गए ..........चहरे ...कितने ...चहरो पर चहरे ..कितने ...कभी सोचा है ???
कुदरत से हमे जो एक चहरा मिला है , उस चहरे पर हम न जाने कितने चहरों का भोझ लिए घूम रहे है ? ...यूँ तो चहरा एक ही होता है लेकिन दूसरो का उसे देखने का नज़रिया अलग अलग होता है ...हर शक्स के लिए एक नया चहरा ?...अपनी कार से ज़यादा चमचमाती अपने मित्र की कार देख उसे दूर से मुस्कुराते हुए हाथ हिलाना ...और मिलकर अपनी मित्रता का परिचय देना ....फ़िर थोड़ी ही दूर किसी ट्रेफिक में फस कर किसी ...रिक्शे ॥या ठेले ..वाले पर अपनी शालीनता का परिचय देना ?...
ऑफिस पहुँचते ही ...बहार खड़े गाड से कहना ...अबे ओये ॥इधर आ ..ये ले पैसा ..फलां चीज़ लेकर मेरे चैम्बर में आना ..और हाँ ...जल्दी आना ...समझा ना ...ऑफिस की महिला रिशेप्शननिस्ट के हेलो ..का मुस्कुराते हुए जवाब देना ..और फ़िर अपने चैम्बर की तरफ़ चले जाना.....बॉस के बुलावे पर ...उनके सामने ...सर ..सर ...सर ...मैं इसे अभी देख लेता हूँ ...दुबारा एसा नहीं होगा ?..बहार निकलते ही ...अपने कलिग से ...बहुत ही सनकी आदमी है ये ...इसे तो देख लूँगा ?...हाथ में सामान लिए खड़ा गाड..सर ...ह्म्म्म ...जा वहां रख दे ?...
हलाँकि ये तो किसी उपन्यास के बीच का हिस्सा लगता है ...लेकिन इस बात में कई हद तक सच्चाई छुपी हुई है ...हर किसी के लिए हम अपने चहरे ...चरित्र को बदलते है...हर किसी का नज़रिया हमे देखने का अलग होता है ...ना जाने हर रोज़ हम कितने चहरे बदलते है ...कुछ लोग अपनों की शक्ल में तो होते है ...लेकिन अपने कभी नहीं हो सकते ?...कभी पराया सा लगने वाला ही अपना हो जाता है ....
शायद दुसरे को देखने का हमारा ये नज़रिया ....वो सामाजिक नज़रिया हो सकता है ...जिसमे हम पद..पैसा ..या पॉवर के आधार पर तुलना करते है ?... लेकिन कहीं न कहीं हम अपने ख़ुद के वजूद को खत्म करते जा रहे है ?...ख़ुद अपने चहरे पर इतने चहरे लगाते जा रहे है ॥के ख़ुद को पहचानना भी मुश्किल होता जा रहा है ?...किसी विद्वान ने कहा है ..आप का असली चहरा वो ही है ....जिस तरह आप अपने नौकर से पेश आते है ...
Monday, December 22, 2008
आख़िर क्या है ये ज़िन्दगी ?

ज़िन्दगी की शुरुवात ही न जाने कितनी ख्वाइशों से शुरू होती है , कुछ महलों में सजती है तो कुछ मुफलिसी में , लेकिन ज़िन्दगी जहाँ भी हो कई उम्मीद लेकर आती है , किसी की किस्मत में सारा आसमा है तो किसी की किस्मत में रत्ती भर की ज़मीं भी नहीं ? ज़िन्दगी फ़िर भी हर हाल में मुस्कुराती है ...
तमाम मुश्किलें ... तमाम रास्ते है ... कहीं रास्ते आसां है ॥ कहीं मुश्किलें ज़ियादा भी है लेकिन ये ज़िन्दगी है ...जो बस चलती रहती है कहीं खुशियों का समंदर खारा सा लगता है तो कहीं एक बूंद सी खुशी समंदर सी लगती है , छोटी छोटी सी खुशियों से कहीं आशियाना सा बनता दीखता है और कहीं बड़े बड़े आशियाने में छोटी सी खुशियाँ भी नहीं दिखती ...आख़िर क्या है ये ज़िन्दगी ???
कभी कहीं सड़क के किनारे किसी शख्स को देखा है ठिठुरती ठंड में एक छोटी सी चादर लिए जिससे उसके पैर बाहर की तरफ निकले हुए चैन की नींद सो रहा है ...खाब उसके भी होंगे एक नई सुबह की ॥ जो उसकी तकलीफों को कुछ कम कर सके ... हसरतें अभी मरी नहीं है ...कहीं किसी कोने में छुपा कर के रखी है ...शायद तलाश है उसे अपने किसी की ... जिससे वो बयां करे ...
एक रात ये भी है ..रौशनी से नहाई हुई है ... सेकडों की भीड़ ... लेकिन कुछ तनहा से लग रहे है... खुशामिजाज़ी का मंज़र भी है ...शानोशौकत में कुछ कमी नहीं है ...शायद खुशियों की कुछ कमी तो नहीं सी लगती है ...सब कुछ पा लिया लगता है ... फ़िर भी ज़िन्दगी से बहुत तमन्नाएँ अभी बाकी है ...और एक रात की सुबह का मंज़र कुछ ऐसा होगा कभी सोचा ना था ...ज़िन्दगी तलाश रही है बिखरे हुए कचरे के ढेर में ज़िन्दगी ...आख़िर क्या है ये ज़िन्दगी ???
Monday, November 17, 2008
जीवन क्या है ?
दुःख बिना सुख ना भावे ,
दर्द बिना आराम न आवे !
जो मिल जाये बिन महनत उसका
मोल नहीं कुछ होवत है ,
जोड़ जोड़ के तिनका तिनका
ऐसा मन को भावत है !!
सागर सागर किस काम का जो
प्यास भी ना भुझा पावत है ,
बूंद बूंद मिल जाये तो
मन भर प्यास भुझावत है !!
धरती की विशाल है काया
फिर भी आकाश संमावत है ,
छोटे छोटे पर है
मेरे इसमें आकाश समाये रे !!
संबंधों की डोर है कच्ची
प्रेम प्रेम से जिले तू ,
एक बार जो जाये फिर तो
वापस नहीं वो आवत है !!
और जीवन काल बहुत है
छोटा जिले जीवन सरल सरल ,
जीते जी कोई पूछे न है !
मर के याद ना आये गा ,
बात मान ले मेरी
वरना जीवन भर पछतायेगा जीवन भर पछतायेगा !!!
दर्द बिना आराम न आवे !
जो मिल जाये बिन महनत उसका
मोल नहीं कुछ होवत है ,
जोड़ जोड़ के तिनका तिनका
ऐसा मन को भावत है !!
सागर सागर किस काम का जो
प्यास भी ना भुझा पावत है ,
बूंद बूंद मिल जाये तो
मन भर प्यास भुझावत है !!
धरती की विशाल है काया
फिर भी आकाश संमावत है ,
छोटे छोटे पर है
मेरे इसमें आकाश समाये रे !!
संबंधों की डोर है कच्ची
प्रेम प्रेम से जिले तू ,
एक बार जो जाये फिर तो
वापस नहीं वो आवत है !!
और जीवन काल बहुत है
छोटा जिले जीवन सरल सरल ,
जीते जी कोई पूछे न है !
मर के याद ना आये गा ,
बात मान ले मेरी
वरना जीवन भर पछतायेगा जीवन भर पछतायेगा !!!
Saturday, November 1, 2008
मैं ख़ुदा हूँ ???

धरती पर मनुष्य की उपस्थिति के दिन से ही उसने अपने आस पास के वाता वरण को अपने अनुकूल में करने के लिए न जाने क्या क्या किया , सब कुछ अपनी सुविधा के अनुसार , और सफल भी रहा शायद इश्वर ने उन्हें वो असीम शक्ति प्रदान की जो उसे दुसरे प्राणियों से अलग करती है , मनुष्य अब शक्तिशाली है अब सिर्फ़ धरती क्या उसे आसमान को जानने की ललक है भ्रमांड की हलचल को पहचानने समझ भी है इस शक्ति का आकलन करना कठिन है !इस दृष्टिकोण से देखें तो वास्तव में मनुष्य प्रगतिशील दिखता है लेकिन क्या आज के इस दौर में मनुष्य प्रगति की उस राह पर है जहाँ संवेदनाओं की कोई जगह नहीं है, जहाँ अंहकार सर्वोपरी है , जहाँ भावनाओं को समझने की समझ नहीं है , ये वो दौर है जिसे प्रतिस्पर्धा का दौर कहा जाता है यूं तो प्रतिस्पर्धा स्वस्थ भी होती है लेकिन ये होड़ है एक दुसरे से आगे निकलने की , एक दुसरे को नीचा दिखने की , ये वो अवसर है जहाँ इंसान खुद को सबसे ऊपर दिखने की कोशिश में है , क्या ये आज का इंसान है ?
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो फिर ये संबंधों में दूरियों के लिए जगह क्यूँ है ? या संबंधों का बदलना दूरियों की वजह है तो फिर क्या मनुष्य अपने रिश्तों को निभाने में सक्षम नहीं है ? या उसे रिश्ते अब पुराने लगने लगे है ? ...वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन रिश्तों में दूरियां निरंतर बढ़ रही है !
क्या मनुष्य हिंसक होता जा रहा है ? ...अगर हाँ ... तो इसकी वजह क्या है ? क्या इसकी वजह ये है के वो सर्वशक्तिमान बनना चाहता है ? या इस वजह से की वो ये न बन सका ? ॥एक मनुष्य का दुसरे मनुष्य पर हिंसक होना उसे दुसरे से शक्तिशाली होने के गोरव प्राप्त कराता है ,लेकिन जब मानवता की बात हो तो वो इस कतार के खुद को काफी दूर पता है लेकिन अपने अहम् के आगे मर चुकी सवेदनाओं को जीवित भी नहीं करना चाहता है क्यूंकि उसे आगे बने जो रहना है !
आज का मनुष्य शक्तिशाली है क्यूँ की उसका कोई कमज़ोर सामना नहीं कर सकता ? आज का मनुष्य सिर्फ अपने हितों की सोचता है चाहे वो इसके लिए उसे भी कुछ भी त्याग करना पड़े वो पीछे नहीं हटता है , राजनितिक स्वार्थ के लिए कितने बेगुनाहों की बलि दे दी जाती है , धन का लोभ मनुष्य को सब कुछ करने का निमंत्रण देता है , मनुष्य सिर्फ उस असीम शक्ति के पीछे भाग रहा है जिसे पाकर उसकी ख़ुदा बनने की चाहत पूरी हो सके ???
मनुष्य अब उस रास्ते तेज़ी से भाग रहा है जहाँ सिर्फ आगे बढ़ने की होड़ है , अपने विचारो को वो कहीं पीछे छोड़ चुका है एक ललक है उसे पाने की जो दूर से सुन्दर तो लगता है लेकिन सच में उसका कोई अस्तित्व नहीं है लेकिन इस दौड़ भाग में उसने जो पाया { घमंड , अंहकार , संवेदनहीनता , क्रूरता } आदि सब ही प्राप्त कर सका है , इस नासमझी में उसे लगने लगा है ....मैं ख़ुदा हूँ !!!
Thursday, September 25, 2008
ये मेरी ज़िन्दगी ...
ये मेरी ज़िन्दगी बिस्तर की सिलबटों की तरह है ,हर रोज़ ये जीती है हर रोज़ ये मरती है !
कुछ ख़ाब से बनते है , बन के टूट जातें है ,
फ़िर भी ना जाने ये किस आस में जीती है !!
कुछ दर्द है हासिल , कुछ तन्हाई का आलम है ,
हर आहट में ये लेकिन ,किसी का इंतेज़ार करती है !!
शोरगुल नहीं है इसमें , बड़ी चुपचाप सी है ,
खामोशी ही मगर इसकी , परेशान सी करती है !!
जीने जी तमन्ना भी है , और मुस्कुराने की चाहत ,
रूठा हुआ हूँ ख़ुद से मैं , और रूठे हुए हालत है !!
जाने क्या वजह है , जिये जा रहा हूँ मैं,
हर हाल में तेरे साथ "ज़िन्दगी " मुस्कुरा रहा हूँ मैं ...
Wednesday, September 3, 2008
आरज़ू ...

आसमां सी आरज़ू है ,
ख़ाब से हालात हैं !
जीने की है तमन्ना ,
थमी थमी सी सासं है !!
फिरता हूँ मैं दर बदर ,
मिलता नहीं है आसरा !
इस ज़मी पर आशियाने ,
की मुझे तलाश है !!
सारा शहर है बेरहम ,
कोई नहीं मेरा अपना !
काफ़िले में नज़रों को मेरी ,
मेरे अपनों की तलाश है !!
रात भर जागी है शायद ,
सुर्ख़ आखें कह रही है !
अश्क़ से भीगी हुई है ,
फ़िर भी इनमें आस है ,
रोज़ की तरहा इनमें ,
नई सुबह की तलाश है !!!
Friday, August 29, 2008
मुझे श्रधांजलि दीजिये ...
जन्म -३०.०८. 80 से ... ... ...अत्यंत दुःख के साथ ये सूचित करना पड़ रहा है की मैं अनवर कुरैशी आत्मज ...श्री ए जे कुरैशी , का आज के दिन जीवन का एक महत्त्वपूर्ण वर्ष और कम होने जा रहा है ,
इस दुखद समय में आप सभी ब्लागर साथियों के निवेदन है आप सभी इस ब्लॉग में आकर मेरी जीवित आत्मा को शान्ति पहुंचाएं ...और इश्वर से प्राथना करे की मेरा बाकी का बचा हुआ जीवन किसी के काम आ सके ....
शोकाकुल ...
अनवर कुरैशी
रायपुर { छ.ग }
नोट :- सभी ब्लागर साथयों से निवेदन है की टिपण्णी पश्चात् भोजन की व्यस्था स्वयं के घर पर है कृप्या भोजन उपरांत ही प्रस्थान करे ..धन्यवाद ...
Saturday, August 23, 2008
लूट सको तो लूट लो ...

फोकट का सामन है भैय्या ,
लूट सको तो लूट लो !
खुली हुई दूकान है भैय्या ,
लूट सको तो लूट लो !!
ना इसमें कोई मिर्च है , ना है कोई मसाला ,
ना अखछर की पहचान है इसमें !
ना शब्दों की वर्ण माला ,
बिखरा हुआ सामन है भैय्या ,
लूट सको तो लूट लो !!
गुमसुम गुमसुम चुप बैठा है ,
कोई नहीं है सुनने वाला !
कूड़ा करकट दान है भैय्या ,
लूट सको तो लूट लो !!
सोने की चिड़िया के तुमने ,
पर क़तर डालें है ,
भारत का तुम भोग हो करते ,
और नेता कहलाते हो ,
काब तक लूटोगे देश को ,
मेरा कहा अब मान लो ,
पूरा पाकिस्तान पड़ा है ,
लूट सको तो लूट लो ......
Thursday, August 21, 2008
पत्नी केयर टेकर पति उसका मालिक ?

स्त्री के अनेक रूप हम सभी ने अपने जीवन में देखे है , माँ , बहन , पत्नी , बेटी , ये सभी पात्र पुरूष के जिवन से होकर कभी ना कभी ज़रूर गुज़रते है , और ये सभी जीवन में एक विशेष महत्व रखते हैं , स्त्री हमेशा से ही बलिदान का वो चहरा रही है जिसने हालात के साथ ना जाने कितने समझौते किए है , बेटी रही तो पराई रही , पत्नी हुई तो बहु बन गई , और माँ बन कर बच्चों के भविष्य के लिए समझौते !
पुरूष प्रधान समाज में आज भी स्त्री की जगह उस कोने में है जहाँ से सिर्फ़ झाँका जा सकता है या किन्ही फैसलों को सुना जा सकता है चुप्पी साधे हुए , जहाँ उन्हें फैसलों को मानने की बाध्यता होती है , बिना उनकी बात सुने बगेर , ये हालत भारत के उस सत्तर प्रतिशत छेत्र में है जहाँ ग्रामीण आबादी बस्ती है ,
पुरूष के जिवन का एक पात्र { पत्नी, वैसे सभी पात्र प्रभावित करते है } वास्तव में प्रभावित करने वाला है , पराई बेटी से जब पत्नी बनके किसी पुरूष के जिवन में प्रवेश करती है साथ ही वह बहु कहलाने लगती है तब परिवार की सारी जिम्मेदारियों का भोझ भी उस अबला नारी पर ही होता है , कुल मिलकर परिवार से लेकर पति तक केयर टेकर की भूमिका में पत्नी होती है जिसका मालिक उसका पति होता है ?
वैवाहिक जिवन में पुरूष को वो सारे संवैधानिक अधिकार प्राप्त होते है जिसमे पत्न्नी द्वारा पति को वो सारे सुख जिसकी वो अपेक्षा रखता है नहीं मिलने पर पत्नी को प्रताड़ित किया जा सकता है या यूं कहिये मानसिक रूप से विकलांग पुरूष अपनी नंपुसकता का परिचय देते हुए पत्नी को प्रताड़ित करता है , जिसमे पत्नी की भूमिका सहने मात्र की होती है , अपने मूल अधिकारों से अज्ञान स्त्री !
दूसरी तरफ़ हालत कुछ बदले बदले से है भारत चाहे वो तीस प्रतिशत आबादी जो शहरों में बस्ती है अपने अधिकारों से पुरी पुरी तरह वाकिफ है , वो पीछे नहीं साथ मिलकर चलना चाहती है ...कुछ तो मर्दों से आगे भी निकल गई है , कभी मर्दों के नीचे दबी कुचली औरत अब मर्दों के ऊपर आने लगी है , ये विश्वास उन महिलाओं में है जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है , जो किसी भी रूप में मर्दों से पीछे नहीं है , वो कंधे से कन्धा मिलकर चलना चाहती है ,
बड़ी ही अजीब विडंबना है , जिस देश में स्त्री को देवी की तरह समझा जाता है और उसकी पूजा की जाती है उसी देश में स्त्री घरेलू हिंसा का शिकार हो रही है , या फिर के टोनही होने के शक में उसे पुरे गावं में नंगा करके घुमाया जाता है , किसी ना किसी बहाने से स्त्री पर अत्याचार होता रहता है ॥लेकिन स्त्री अपने होटों को सिले सारे अत्याचारों को सहती रहती है
इक्कीसवीं सदी में भी समाज या के पुरुष की सोच में स्त्री के प्रति कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है शहरी छेत्रों को छोड़ दिया जाये तो ग्रामीण इलाकों में आज भी स्त्री को पुरुष अपनी खरीदी हुई जागीर समझता है , अपने अधिकारों से अनजान स्त्री प्रताड़ना का शिकार होते रहती है लेकिन उसकी सुनने वाला कोई नहीं होता है ,
समाज की नज़र से देखा जाये तो स्त्री "पत्नी " की भूमिका पुरुष "पति " के लिए एक केयर टेकर की होती है जिसका मालिक उसका पति होता है !!!
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