Saturday, July 26, 2008

सच में बड़ा सुकून पहुचाती हो तुम ...

4 टिप्पणियाँ
जब जब तन्हाइयों में तेरा साथ होता है ,
सच में बड़ा सुकून पहुचाती हो तुम !
कांपते हाथों को तेरा सहारा मिल जाता है ,
लग के होटों से सारी दूरियां मिटाती हो तुम ,
सच में बड़ा सुकून पहुचाती हो तुम !!
वो कांच के टुकड़ों की चुभन ,
और प्यार से गर्दन को सहलाना ,
धीरे धीरे मेरी सासों में समां जाना ,
ले लेना मुझे अपने आगोश में ,
अपने होने का मुझे अहसास कराना ,
हर वक्त याद आती हो तुम ,
सच में बड़ा सुकून पहुचाती हो तुम !!
कभी बन के धुवां आसमान में छाजाती हो तुम ,
ना जाने कितने हासीन चहरे बनाती हो तुम ,
मुझे ले करके किसी हसी दुनिया में ,
हर खुशियों का एहसास कराती हो तुम ,
आखरी दम तक देती हो साथ मेरा ,
मेरी खुशियों के वास्ते जल जाती हो तुम ,
सच में बड़ा सुकून पहुचाती हो तुम !!
{ वैधानिक चेतावनी - सिगरेट पीना स्वास्थ के लिए हानि कारक है }

अब के गिरो तो ज़रा संभल के गिरियेगा !

1 टिप्पणियाँ

चलते चलते अगर आप के कभी पाँव फिसल जाये इससे पहले कोई देखे आप खुद ही संभल जाएँ या अगर ना संभल सके तो समाज के उस चहरे का मज़ाक बनने के लिए तैयार रहे जो आप को कही दूर टक टकी लगाये देख रहे है , जिसे इस बात में मज़ा आ रहा है की वह इंसान सड़क पर फिसल के गिरा हुआ है , बड़ी अजीब सी विडम्बना है लेकिन इस मानसिकता के लोग सड़क पर गिरे इंसान को क्या इतना गिरा हुआ इंसान समझते है की समूह में उसपर हँसा जाता है ?
बड़े ही शर्म की बात है...लेकिन क्या सच में हमे इस तरह के संस्कार मिले है की किसी के गिरने पर हँसा जाये ? तरस आता है मुझे इस तरह के लोगों पर , हसने के और भी बहाने हो सकते है लेकिन किसी की बेबसी पर हँसना कितना जायज़ है ?
बहुत कम ही ऐसे लोग है जो किसी गिरते हुए को सहारा दे , बहुत की कम ऐसे है जो किसी की ज़रूरत के वक्त काम आयें , चलिए किसी गिरते हुए को सहारा ना दे , किसी की ज़रूरत के वक्त काम भी ना आयें लेकिन कुछ तो इंसान होने का परिचय दें , कभी तो उस सड़क पर पड़े पत्थर को ठोकर मारीये जो किसी दुसरे की ठोकर में आयें , किसी को रास्ता ना दिखाएँ लेकिन उसके रास्ते का अड़ंगा ना बने , कैसे इस तरह के लोगों की सोच को बदली जाये के किसी पर हसने से ज़ादा अच्छा ये है के अपना हाथ बढाके उसका सहारा बना जाये , मुझे नहीं मालुम आप ही बताइए ? ना बताना चाहिए तो ज़रा संभल के चलियेगा सड़क पे कई चहरे आप पर टक टाकी लगाये बैठे है ?

Friday, July 25, 2008

समाज की राह देखती रही उसकी लाश !!!

2 टिप्पणियाँ

बड़े ही अफ़सोस की बात है लेकिन ये सच है की इक्कीसवीं सदी में भी हमारे समाज का रूढीवादी चहरा अब भी नहीं बदला है , आज भी लोग अपने द्वारा बनाये गए समाज के तुगलकी फरमानों का शिकार हो रहे है , बात आज की नहीं बीस साल पुरानी है दुर्गा प्रसाद को ये नहीं मालुम था के ये फैसला मरने के बाद भी उसका पीछा नहीं छोडेगा , और उसने एक दलित से प्रेम विवाह कर लिया !
समाज से उसे बेदखल कर दिया गया पूरा का पूरा गावँ उसके विरोध में खड़ा हो गया उसके अपने पराये हो गए , उसके साथ ना कोई बात करता और ना ही कोई उनके घर जाता , ये सज़ा उन्हें दूसरी जाति में शादी करने की मिली , उस वक्त से दुर्गा प्रसाद घीनोने समाज का बदनुमा चहरा रोज़ ही देखता रहा कभी दूकान में कभी सड़क पर या कभी चौपाल पर !
शायद दुर्गा को ले लगा होगा के समाज का मुखौटा लगाए मेरे अपने मुझे एक दिन फिर से स्वीकार कर लेंगे ? लेकिन ऐसा हुआ नहीं, और एक दिन दुर्गा की आत्मा ने भी उसके शारीर का साथ छोड़ दिया , घर में मातम छाया हुआ था दुर्गा प्रसाद की पत्नी परेशान थी क्यूंकि दुर्गा की अर्थी को कन्धा देने के लिए गावं का एक आदमी भी तैयार नहीं था , दुर्गा ने अछूत लड़की के विवाह जो किया था , दुर्गा की लाश यूही घंटो पड़ी रही लेकिन उसे हाथ लगाने वाला कोई नहीं था ,
पूरा का पूरा गावँ तमाशा देखता रहा लेकिन मदद के लिए कोई भी आगे नहीं आया , मरने के बाद भी दुर्गा प्रसाद समाज से बहिष्कृत था फिर किसी तरह दूसरी समाज सेवी संस्था ने उनका अंतिम संस्कार किया !!!
 

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