Wednesday, July 23, 2008

बड़ी ख़ामोश सी है ये शाम !!!

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बड़ी खामोश सी है ये शाम,
और तन्हाई का आलम है ,
दखने से लगता है के सब चुप है ,
लेकिन दिल में लाखो सवाल है , कई आरज़ू सीने में दबा राखी है ,
कोई चेहरा नहीं है बयां करने के लिए,
यूँ तो हर वक्त है काफिला सा ,
फिर इतना तनहा में हर वक्त क्यूँ हूँ ,
बे रंग नहीं थी कभी ज़िन्दगी ,
मेरे खाबो ने मेरा रंग चुराया है ,
हारा नहीं हूँ मैं , ज़िन्दगी तुझसे ,
कुछ हालत ही ऐसे है ,
मैं खुद से खफा हूँ !!!

Tuesday, July 22, 2008

उनकी हथेली में लिपटा वो पचास का नोट !!!

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मैं उस दिन खुश था , सोचा चलो आज बाज़ार की सैर की जाए , शाम होते ही मैंने साफ़ सुतरे कपड़े पहने , अपना पसंदीदा डीओ लगाया और निकल गया बाज़ार की तरफ़ ...फ़िर मुझे याद आया मेरा पुराना अज़ीज़ दोस्त जिसकी इलेक्ट्रिकल्स की शॉप है बाज़ार में , बस सोच ही लिया आज की शाम उसके साथ ही बिताना है , पहुचते ही उसने मुझे देखा ..खुश हुआ मैं भी खुश हुआ और हसी ठिठोली करते हुए हम दोनों उस माहोल में ढल गए , उसके ग्राहक आते रहे वो उन्हें निपटता रहा , फ़िर कुछ देर बाद मैंने ४ से ५ लोगों को उसकी दूकान में आते हुए देखा , वो थोड़े डरे सहमे से लग रहे थे शायद किसी पास के गावं से आए थे , उनके कपड़े कुछ गंदे से थे चप्पल थोड़ी पुरानी हो चली थी मोचियों की नक्काशी भी दिख रही थी , लगभग ४० की उस महिला से मेरे मित्र से कहा ....टार्च है क्या ? मित्र ने कहा है ... और टार्च लाने चला गया ...इस बीच वो महिला अपने साथ आए २-३ लोगों से बात करने लगी ... मित्र आया और टार्च दिखाने लगा ...ये १०० का है ..ये ८० और ये ६० का है ...महिला ने कहा इतना महंगा ?? और नहीं तो क्या सस्ता तो लगा रहा हूँ ...लेकिन ये जवाब शायद उस गरीब के लिए ही था ? क्यूँ की इससे पहले वो कुछ साफ़ सुतरे लोगों से अच्छे से बात कर रहा था ? सहमी सी महिला अपने साथ आये लोगों की तरफ देखने लगी .. फिर अपनी हथेली में लिपटे नोटों को गिनने लगी वो पचास रूपये थे , दस फिर भी कम थे , पास खड़ी साथ आई अपनी महिला से उसने दस रूपये लिए और मेरे व्यापारी मित्र को दे दिए ...और हल्की सी मुस्कान लिए दूकान से सभी चल दिए ......मैं दूर बैठा सब कुछ देख रहा था , मुझे लगा के टार्च के कुछ पैसे कम कर देने चाहिए थे मेरे दोस्त को लेकिन उसने नहीं किया... मुझे अपने दोस्त पर बहुत गुस्सा आ रहा था ...लेकिन क्या किया जा सकता था मैं एक व्यापारी की नज़र से उन लोगों को नहीं देख रहा था ... मुझे उस महिला के हाथों में लिपटे हुए पचास के नोटी की कीमत ५०० से भी ज़यादा लग रही थी , कतनी महनत से उसने वो पैसे कमायें होंगे ? या कितनी बचत की होगी टार्च खरीदने के लिए ..उसके पैसो की कदर करने वाला मेरा दोस्त शायद नहीं था , कुछ पैसे कम कर भी देता तो उसका क्या जाता ? लेकिन ये घटना उसे एक अच्छा व्यापारी होने का संकेत ज़रूर दे रही थी, लेकिन मेरा मन विचलित हो गया था , पचास के नोट के पीछे का दर्द मैं उस महिला के चहरे पर देख रहा था , मैं इस बात को बखूबी समझ रहा था की ये पैसा कितनी महनत के बाद कमाया गया है ..इन पैसो में अगर एक रूपये की भी बचत हो जाये तो ये उस महिला के कितने आम आ सकता है इसका मुझे अंदाजा था लेकिन ऐसा हुआ नहीं ....मैं अपनी उदास रात लिए वापस लौट आया ... हाँ इतना ज़रूर है को वो पचास का नोट मुझे आज भी ये याद दिलाता रहता है की उसकी कीमत ५०० से कहीं ज़यादा है ....

Monday, July 21, 2008

कानून के जानकारों मेरी आवाज़ सुनो...

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वकील साहब ,


नमस्कार ........


बहुत समय से मेरे मन में देश के कानून को लेकर कई सरे सवाल दौड़ रहे है ,मैं ख़ुद से सवाल करते करते थक गया हूँ , लेकिन जवाब अब भी नहीं मिला है ,


क्या हमारे देश के कानून से बढ़कर भी कुछ है ???


इसमें तो कोई दो राय नहीं हो सकती है के हमारे देश का कानून लचर है धीमा है फैसलों में कई कई साल लग जाते है लेकिन फ़िर भी फैसले होते नहीं है ? देरी की वजह से साक्ष भी मिटते जाते है , आरोपियों को इसका फायदा भी मिल जाता है वो बच निकलते है ?


लेकिन हमारा कानून कहता है के भले ही १०० आरोपी छुट जायें लेकिन एक बेगुनाह को सज़ा नहीं होनी चाहिए , ये अच्छी बात है बेगुनाह को सज़ा ना हो , लेकिन मैंने जो अपने आस पास देखा है उसमें कई ऐसे मामलें है जिसमें बेगुनाह को आरोपी बना दिया जाता है , जेल में ठूस दिया जाता है , केस चलता रहता है , पेशी आती जाती रहती है , सालों बीत जाते है , अखबारों में खबरें आती रहती है फलां ने हत्या कर दी , बलात्कार कर दिया , पुलिस अपनी ब्रीफिंग में उसके ख़िलाफ़ पुरी कहानी छपवाती रहती है , कुल मिलकर उसकी चरित्र हत्या कर दी जाती है और वह बलात्कारी मानसिकता के सामने बेबस होता है , बेबस इंसान बेचारा क्या कर सकता है ? उसवक्त उसकी कोई सुनने वाला नहीं होता है , { हाल ही में आरुशी हत्याकांड में भी उनके पिता पर कुछ एस तरह के आरोप भी लगे थे }


लेकिन रहत की बात ये होती है की माननीय न्यालय उसे बा इज्ज़त बरी कर देता है , लेकिन क्या फ़िर वो अपनी पुरानी जिंदगी में वापस लौट सकता है ? क्या समाज उसे फ़िर से अपना लेता है ? क्या उसके अपने या उसके आसपास के लोग उसे स्वीकार कर लेते है ? क्या उसकी खोई हुई इज्ज़त वापस आ जाती है { कोर्ट के इस फैसले से क्या इज्ज़त बरी किया जाता है } नहीं साहब नहीं आती है , समाज उसे दुबारा स्वीकार नहीं करता है , उसपर लगा कलंक सारी जिंदगी उसके साथ रहता है , और उसके जीवन को नर्क बना देता है , वो किसी को मुह दिखाने के लायक नहीं रहता है ,
अब वो क्या करे? उसके साथ जो बीता है उसका दोषी कौन है ? अदालत या समाज ? क्या समाज अदालत से बड़ा है ? जो उसे स्वीकार नहीं करता या अदालत के फैसले को नहीं मानता ?या फिर के पुलिस ? जिसने उसका चरित्र हनन किया है ? या के वो पत्रकार या अखबार जिसने ये सब छापा है ? क्यूँ के अदालत से बा इज्ज़त बरी होने की खबर तो उसने नहीं छापी ? दोषी चाहे कोई भी हो ये बात तो तय है की उसकी ज़िन्दगी तो बर्बाद हो गई !

ये हर उस आप आदमी की समस्या हो सकती है जिसने अपराध ना किया हो लेकिन इस तरह की सज़ा सारी ज़िन्दगी भुगत रहा हो ? मुझे जवाब चाहिए , सीधा सादा सा , बिना किसी दावं पेच के , क्या मेरी ज़िन्दगी मुझे वापस लौटा सकते हो ?
 

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