Sunday, July 20, 2008

बना दो मुझे भी सांसद एक बार !!!

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मुझे भी एक सांसद बना दो ,
चाहे उसपे हतकड़ीयां लगवादो !
जेल में तुम मुझको सडा दो ,
मुझे भी एक सांसद बना दो !!
कभी आएगी जब मेरी भी बरी ,
खूब करूँगा मैं अपनी खरीदारी
कभी इधर तो कभी उधर लुड़क जाऊंगा ,
जिधर जियादा मिलेंगे वहीँ बिक जाऊंगा
प्रधानमंत्री के घर खाने को जाऊंगा ,
हर तरफ होगा , सिर्फ मेरा बोलबाला
कितने में बिका है ये सांसद साला
गाली भले ही मैं सबकी खाऊँगा ,
एक एक वोट की कीमत लगाऊंगा !!
पार्टी कहे चाहे मुझको दलाल
देश हित में फिर भी बिक जाऊंगा ,
मिलजायेगी मुझको भी एक लाल बत्ती
केबिनेट का मैं भी एक हिस्सा कहलाऊंगा
देश की सेवा में खुद को लगाऊंगा ,
बची कुची खुरचन मैं खुद ही खाजाऊंगा !!
फिर जब आएगी चुनाव की बारी
मिलूँगा जनता से मैं बारी बारी ,
कहूँगा सभी से मैं सिर्फ एक बात
बना दो मुझे फिर से सांसद एक बार !!!
{{{ दिल पे मत ले यार , जो बन जाए सरकार , तो हो गया बंटाधार }}}

Tuesday, July 15, 2008

काजल की कोठरी ???

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देश आज जिस राजनैतिक अनिश्चिताओं के दौर से गुज़र रहा है , इन्ही सब के बीच ये भी ख़बर आ रही है के सरकार बचाने के लिए यू.पी.ए सांसदों की खरीद फरोख्त में लगा हुआ है ? ये कह रहे है ए.बी.वर्धन !
क्या सच में हमारे देश के संसद बिकाऊ है ? क्या उन्हें ख़रीदा जा सकता है ? हालाँकि एक बार टीवी पर देखा था कुछ लेते -लेते , लेकिन सभी ऐसे होंगे ? कुछ नही भी , काजल की कोटरी में काला होना तो लाज़मी है ? लेकिन वर्धन साहब ने कहा है तो कुछ सोच समझ कर ही कहा होगा ? उनका पुराना तजुर्बा हो सकता है ???
लेकिन अगर ये सच है तो ये सच, सच में बहुत ही शर्मनाक है ? देश का प्रतिनिधित्व करने वाले अगर बिकाऊ हो जायेंगे तो देश का क्या होगा ? और वेसे भी देश की फिकर है भी किसको ?अगर एक सांसद बिकता है तो वह किस श्रेणी में आता है ..देश द्रोह या देश हित ? बिका तो सरकार बच सकती है ? चुनाओ का भोझ गरीब जनता पर न पड़े हो सकता है इसका ख़याल सांसद जी को हो ? एक बात तो है हमारे देश मैं सब कुछ बिकाऊ है बस इन्तेज़ार है तो एक अच्छे खरीददार की , जो हमे खरीदते हुए अपने बदन में कोई कैमरा ना छुपा रखा हो ???
लेकिन ये तो सच है की जिस तरह से ये खबरें आ रही है कि सरकार बचने के लिए सांसदों कि खरीदी कि जा रही है , कुछ सांसदों को तो जेल से भी निकला जा रहा है एक वोट के लिए , जिन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई है, ये देश कि गन्दी राजनीति का एक चहरा है ? पता नहीं इस दलगत राजनीति के और कितने चहरे दिखेंगे ?लोकतंत्र की ये मिसाल एक काजल की कोटरी बन के रह गया है ? अब इसमें कुछ साफ़ सुत्रि छवि के लोग भी होंगे तो इससे खुद को कैसे बचायेंगे ???

Wednesday, July 9, 2008

क्यूँ ना मैं आत्महत्या कर लूँ ???

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वो शाम का वक्त था , मैं से ज़माने की भागदौड़ से कही दूर तनहइयो में बैठा, अपनी ज़िन्दगी का हिसाब किताब कर रहा था, सोच रहा था के मैंने इस दुनिया में क्या खोया और क्या पाया ???डूबते हुए सूरज की लों मेरी आखों से टकरा रही थी, और मेरे आंसू मेरी आखों का साथ छोड़ रहे थे, मन में हजारों सवाल दौड़ रहे थे, मेरे साथ ही ऍसा क्यूँ हुआ ? हमेशा मेरे साथ ही ऍसा क्यूँ होता है ? भगवन तुम ने मेरे साथ ऍसा क्यूँ किया ? फिर अचनक मेरे मन में एक सवाल आया ? क्यूँ ना में आत्महत्या कर लू ???मेरे पल भर के इस फैसले ने मुझे कुछ सोचने को मजबूर कर दिया ? अगर में मर गया तो क्या होगा??? मेरे घर में मेरे अंतिम संस्कार की तयारी चल रही है , मेरे बुजुर्ग पिता का चहरा मायूस है उनकी आँखे पत्थर हो गयी है , जिस उम्र में उन्हें मेरे साथ की ज़रूरत है मैने छोड़ दिया है , वो किसी तरहा बस खुद को संभाले हुए है ? बस उन्हें अब इसी ग़म से जीना है,दूसरी तरफ वो जिसने मुझे नाज़ो से पाला,मेरी हर छोटी बड़ी जिद को पूरी करती रही , मेरी हर गलतियों को माफ़ करती रही , बस मुझे खुश देखने के लिए पता नहीं उसने क्या क्या किया , मेरी माँ ...उसके आसूं तो जेसे थमने का नाम ही नहीं ले रहे है , रो-रो के उसने अपना बुरा हाल कर लिया है , उसे अब भी यकीं नहीं है के मै अब इस दुनिया में नहीं हूँ ?? उसे अब भी ऐसा लगता है के मै अभी उठ जाऊंगा और कहूँगा ...माँ... ??? मेरी नादान माँ ??? कितने सपने देखे थे मेरे लिए ? मैंने सब तोड़ दिए.. उनके सरे अरमानो का गला घोट दिया ... ना जाने अब वो इस हादसे को कब भूलेंगी ??? शायद सारी ज़िन्दगी नहीं !कुछ भीड़ सी दिखी , भीड़ के बीच में मेरा मायूस भाई नम आखे लिए मेरे कुछ अज़ीज़ दोस्तों को कुछ बता रहा था ? सब बहुत उदास थे , दुखी थे , सबको मुझे खोने का ग़म था ? बहुत से लोग मुझसे बहुत सी बाते कहना कहते थे ? लेकिन अफ़सोस मैं तो इस दुनिया में नहीं था , मैं दूर खड़ा सब देख रहा था , अपने किये पर शर्मिंदा था , अपने किये की माफ़ी चाहता था , मुझे अपने माता पिता की पीड़ा देखी नहीं जा रही थी , दोस्तों को खोने का ग़म सता रहा था , लेकिन मुझे माफ़ी नहीं मिल रही थी, क्यूँ की मैं इस दुनिया में था ही नहीं !!!इतना सोच मेरा बदन कापने लगा , मैने अपना सर उपर किया तो देखा सूरज डूब चूका था , टिमटिमाते तारे और धुन्दला सा चाँद दिखा, मैंने अपनी नम आखों को पोछा, मुझे अपने उस सवाल पर पछतावा हुआ , और फिर मेरे मन में एक सवाल आया ? मेरी एक ज़िन्दगी कितनी जिंदगियों से जुडी है ? मेरी ज़िन्दगी मेरे लिए ही नहीं दुसरो ले लिए भी है मेरे अपनों के लिए भी है और उनका ये हक मैं उनसे भला कैसे छीन सकता हूँ !!!{{{ यह लेख एक काल्पनिक सत्य है , इस तरह के विचार अगर आप के मन में हो तो कृपा कर इसे निकाल दे , हम आप के आभारी होंगे , }}}
 

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