Monday, December 22, 2008

आख़िर क्या है ये ज़िन्दगी ?

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ज़िन्दगी की शुरुवात ही न जाने कितनी ख्वाइशों से शुरू होती है , कुछ महलों में सजती है तो कुछ मुफलिसी में , लेकिन ज़िन्दगी जहाँ भी हो कई उम्मीद लेकर आती है , किसी की किस्मत में सारा आसमा है तो किसी की किस्मत में रत्ती भर की ज़मीं भी नहीं ? ज़िन्दगी फ़िर भी हर हाल में मुस्कुराती है ...


तमाम मुश्किलें ... तमाम रास्ते है ... कहीं रास्ते आसां है ॥ कहीं मुश्किलें ज़ियादा भी है लेकिन ये ज़िन्दगी है ...जो बस चलती रहती है कहीं खुशियों का समंदर खारा सा लगता है तो कहीं एक बूंद सी खुशी समंदर सी लगती है , छोटी छोटी सी खुशियों से कहीं आशियाना सा बनता दीखता है और कहीं बड़े बड़े आशियाने में छोटी सी खुशियाँ भी नहीं दिखती ...आख़िर क्या है ये ज़िन्दगी ???


कभी कहीं सड़क के किनारे किसी शख्स को देखा है ठिठुरती ठंड में एक छोटी सी चादर लिए जिससे उसके पैर बाहर की तरफ निकले हुए चैन की नींद सो रहा है ...खाब उसके भी होंगे एक नई सुबह की ॥ जो उसकी तकलीफों को कुछ कम कर सके ... हसरतें अभी मरी नहीं है ...कहीं किसी कोने में छुपा कर के रखी है ...शायद तलाश है उसे अपने किसी की ... जिससे वो बयां करे ...


एक रात ये भी है ..रौशनी से नहाई हुई है ... सेकडों की भीड़ ... लेकिन कुछ तनहा से लग रहे है... खुशामिजाज़ी का मंज़र भी है ...शानोशौकत में कुछ कमी नहीं है ...शायद खुशियों की कुछ कमी तो नहीं सी लगती है ...सब कुछ पा लिया लगता है ... फ़िर भी ज़िन्दगी से बहुत तमन्नाएँ अभी बाकी है ...और एक रात की सुबह का मंज़र कुछ ऐसा होगा कभी सोचा ना था ...ज़िन्दगी तलाश रही है बिखरे हुए कचरे के ढेर में ज़िन्दगी ...आख़िर क्या है ये ज़िन्दगी ???




Tuesday, December 2, 2008

भारत में और कितने ९/११ ...

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महात्मां गाँधी के सिने में लगी ३ गोलियौं ने इस देश से अहिंसा के अध्याय का अंत कर दिया था ? अहिंसा के सबसे बड़े प्रतिक की हिंसा से मौते शायद देश के भविष्य के लिए एक भयंकर संकेत था ? एक वो दिन था और आज भी एक दिन है जब मुंबई में हुए आतंकी हमलों को हम दुनिया का सबसे बड़ा हमला साबित करने पर तुले हुए है ? यहाँ तक की अमेरिका में हुए ९/११ का हमला भी हमे छोटा लगने लगा है , शायद हम ये भूल गए है की किसी भी परिवार के सदस्य की किसी भी आतंकी हमलों में हुई मौत उसके लिए ९/११ से कम नहीं है ? उसका दर्द समझने के लिए किसी ९/११ या मुंबई में हुए हमलों की तुलना करके सम्भव नहीं है , उसकी पीड़ा को तभ ही समझा जा सकता है जब वो परिवार ख़ुद का हो ?
अचानक से हुए इन आतंकी हमलों के बाद से हमारे अन्दर देश भक्ति की एक ऐसी भावना जन्म लेती है जो इस पुरे सिस्टम को बदल कर रख देना चाहती है जो चाहती है की आतंकवाद की जड़ों का सफाया कर दे लेकिन हमारी ये सोच दुसरे ही दिन धुंधली होने लगती है हमे उस मृत शरीर की तेरहवी ही बरसी लगने लगती है ? देश भक्ति की भावना किसी मल्टीप्लेक्स में मिटने लगती है या हर रोज़ की दिनचर्या में हम इतने व्यस्त हो जाते है के स्वयं से अधिक सोचने की हम में छमता ही बाकी नहीं बची होती है ? क्यूँकि को घाव हमारे शरीर का नहीं है उसकी अनवरत पीड़ा का कष्ट हमे नहीं भोगना है हमे उस समय का भी कोई अनुमान नहीं है की ये घाव कब भरेगा ? क्या हम उस समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं ???

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की दुहाई देते घूम रहे हम ...क्या ये नहीं जानते की इसपर भी हमला हो चुका है ? सब जानते हुए भी की भरम में हम जी रहे है ? हमारे द्वारा चुन कर भेजे गए जनप्रतिनिधि अब संसद पर बैठ कर ये तय करेंगे की किसकी सरकार को बचाए रखना है और किसे गिरना है ? किसको समर्थन देकर देश हित के नाम से ख़ुद को फ़ायदा पहुँचाना है ? धर्म के नाम पर वोट की राजनीती किस तरह करना है इसकी रणनीति तय की जानी है ? क्या संसद पर हमले के आरोपी को फँसी नहीं देना चाहिए ? क्या मेलगावं में हुए ब्लास्ट की निष्पक्ष जाँच नहीं होनी चाहिए ? धर्म के नाम पर वोटों के इस बटवारे की वजह से ही आज इस देश में ९/११ जैसी घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है ।हमारे देश में हो रहे आतंकी हमलों के पीछे सिर्फ़ एक ही मकसद है तबाही फैलाना ...लेकिन हमारे राजनीतिज्ञों का क्या मकसद है सब देखते हुए भी सिर्फ़ कुर्सी बचाना ???
अमेरिका में हुए हमले ९/११ के बाद से वहां कोई बड़ी घटनाएँ नहीं हुई इसका कारण है की वहां इस त्रासदी से निपटने के लिए पुरा देश एक साथ खड़ा हुआ और एक देश हमारा है जहाँ आए दिन ९/११ जैसी घटनाये हो रही है लेकिन हम बेबस और लाचार है हम सब कुछ देख रहे है लेकिन कुछ कर नहीं सकते ? इस देश में जब तक धर्म ने नाम पर लड़ना बंद नहीं होगा ,धर्म के नाम पर राजनीती चलती रहेगी , धर्म के नाम से लोगों को बाटा जाता रहेगा तब तक तब तक देश में अमन की कल्पना करना बेईमानी होगी आतंकवाद चाहे देश के बहार का हो या अन्दर का उसका मकसद साफ़ है देश की तबाही ... इस तबाही से देश को बचने के लिए देश के हर नागरिक को देश का सिपाही बनना ज़रूर है बस ज़रूरत है तो सिर्फ़ एक इमानदार कोशिश की ......

Monday, November 17, 2008

जीवन क्या है ?

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दुःख बिना सुख ना भावे ,
दर्द बिना आराम न आवे !
जो मिल जाये बिन महनत उसका
मोल नहीं कुछ होवत है ,

जोड़ जोड़ के तिनका तिनका
ऐसा मन को भावत है !!
सागर सागर किस काम का जो
प्यास भी ना भुझा पावत है ,

बूंद बूंद मिल जाये तो
मन भर प्यास भुझावत है !!
धरती की विशाल है काया
फिर भी आकाश संमावत है ,
छोटे छोटे पर है
मेरे इसमें आकाश समाये रे !!

संबंधों की डोर है कच्ची
प्रेम प्रेम से जिले तू ,
एक बार जो जाये फिर तो
वापस नहीं वो आवत है !!

और जीवन काल बहुत है
छोटा जिले जीवन सरल सरल ,
जीते जी कोई पूछे न है !
मर के याद ना आये गा ,
बात मान ले मेरी
वरना जीवन भर पछतायेगा जीवन भर पछतायेगा !!!

Saturday, November 1, 2008

मैं ख़ुदा हूँ ???

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धरती पर मनुष्य की उपस्थिति के दिन से ही उसने अपने आस पास के वाता वरण को अपने अनुकूल में करने के लिए न जाने क्या क्या किया , सब कुछ अपनी सुविधा के अनुसार , और सफल भी रहा शायद इश्वर ने उन्हें वो असीम शक्ति प्रदान की जो उसे दुसरे प्राणियों से अलग करती है , मनुष्य अब शक्तिशाली है अब सिर्फ़ धरती क्या उसे आसमान को जानने की ललक है भ्रमांड की हलचल को पहचानने समझ भी है इस शक्ति का आकलन करना कठिन है !
इस दृष्टिकोण से देखें तो वास्तव में मनुष्य प्रगतिशील दिखता है लेकिन क्या आज के इस दौर में मनुष्य प्रगति की उस राह पर है जहाँ संवेदनाओं की कोई जगह नहीं है, जहाँ अंहकार सर्वोपरी है , जहाँ भावनाओं को समझने की समझ नहीं है , ये वो दौर है जिसे प्रतिस्पर्धा का दौर कहा जाता है यूं तो प्रतिस्पर्धा स्वस्थ भी होती है लेकिन ये होड़ है एक दुसरे से आगे निकलने की , एक दुसरे को नीचा दिखने की , ये वो अवसर है जहाँ इंसान खुद को सबसे ऊपर दिखने की कोशिश में है , क्या ये आज का इंसान है ?
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो फिर ये संबंधों में दूरियों के लिए जगह क्यूँ है ? या संबंधों का बदलना दूरियों की वजह है तो फिर क्या मनुष्य अपने रिश्तों को निभाने में सक्षम नहीं है ? या उसे रिश्ते अब पुराने लगने लगे है ? ...वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन रिश्तों में दूरियां निरंतर बढ़ रही है !

क्या मनुष्य हिंसक होता जा रहा है ? ...अगर हाँ ... तो इसकी वजह क्या है ? क्या इसकी वजह ये है के वो सर्वशक्तिमान बनना चाहता है ? या इस वजह से की वो ये न बन सका ? ॥एक मनुष्य का दुसरे मनुष्य पर हिंसक होना उसे दुसरे से शक्तिशाली होने के गोरव प्राप्त कराता है ,लेकिन जब मानवता की बात हो तो वो इस कतार के खुद को काफी दूर पता है लेकिन अपने अहम् के आगे मर चुकी सवेदनाओं को जीवित भी नहीं करना चाहता है क्यूंकि उसे आगे बने जो रहना है !
आज का मनुष्य शक्तिशाली है क्यूँ की उसका कोई कमज़ोर सामना नहीं कर सकता ? आज का मनुष्य सिर्फ अपने हितों की सोचता है चाहे वो इसके लिए उसे भी कुछ भी त्याग करना पड़े वो पीछे नहीं हटता है , राजनितिक स्वार्थ के लिए कितने बेगुनाहों की बलि दे दी जाती है , धन का लोभ मनुष्य को सब कुछ करने का निमंत्रण देता है , मनुष्य सिर्फ उस असीम शक्ति के पीछे भाग रहा है जिसे पाकर उसकी ख़ुदा बनने की चाहत पूरी हो सके ???

मनुष्य अब उस रास्ते तेज़ी से भाग रहा है जहाँ सिर्फ आगे बढ़ने की होड़ है , अपने विचारो को वो कहीं पीछे छोड़ चुका है एक ललक है उसे पाने की जो दूर से सुन्दर तो लगता है लेकिन सच में उसका कोई अस्तित्व नहीं है लेकिन इस दौड़ भाग में उसने जो पाया { घमंड , अंहकार , संवेदनहीनता , क्रूरता } आदि सब ही प्राप्त कर सका है , इस नासमझी में उसे लगने लगा है ....मैं ख़ुदा हूँ !!!

Thursday, September 25, 2008

ये मेरी ज़िन्दगी ...

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ये मेरी ज़िन्दगी बिस्तर की सिलबटों की तरह है ,
हर रोज़ ये जीती है हर रोज़ ये मरती है !


कुछ ख़ाब से बनते है , बन के टूट जातें है ,
फ़िर भी ना जाने ये किस आस में जीती है !!



कुछ दर्द है हासिल , कुछ तन्हाई का आलम है ,
हर आहट में ये लेकिन ,किसी का इंतेज़ार करती है !!



शोरगुल नहीं है इसमें , बड़ी चुपचाप सी है ,
खामोशी ही मगर इसकी , परेशान सी करती है !!



जीने जी तमन्ना भी है , और मुस्कुराने की चाहत ,
रूठा हुआ हूँ ख़ुद से मैं , और रूठे हुए हालत है !!



जाने क्या वजह है , जिये जा रहा हूँ मैं,
हर हाल में तेरे साथ "ज़िन्दगी " मुस्कुरा रहा हूँ मैं ...

Wednesday, September 3, 2008

आरज़ू ...

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आसमां सी आरज़ू है ,
ख़ाब से हालात हैं !
जीने की है तमन्ना ,
थमी थमी सी सासं है !!
फिरता हूँ मैं दर बदर ,
मिलता नहीं है आसरा !
इस ज़मी पर आशियाने ,
की मुझे तलाश है !!
सारा शहर है बेरहम ,
कोई नहीं मेरा अपना !
काफ़िले में नज़रों को मेरी ,
मेरे अपनों की तलाश है !!
रात भर जागी है शायद ,
सुर्ख़ आखें कह रही है !
अश्क़ से भीगी हुई है ,
फ़िर भी इनमें आस है ,
रोज़ की तरहा इनमें ,
नई सुबह की तलाश है !!!

Friday, August 29, 2008

मुझे श्रधांजलि दीजिये ...

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जन्म -३०.०८. 80 से ... ... ...
अत्यंत दुःख के साथ ये सूचित करना पड़ रहा है की मैं अनवर कुरैशी आत्मज ...श्री ए जे कुरैशी , का आज के दिन जीवन का एक महत्त्वपूर्ण वर्ष और कम होने जा रहा है ,
इस दुखद समय में आप सभी ब्लागर साथियों के निवेदन है आप सभी इस ब्लॉग में आकर मेरी जीवित आत्मा को शान्ति पहुंचाएं ...और इश्वर से प्राथना करे की मेरा बाकी का बचा हुआ जीवन किसी के काम आ सके ....
शोकाकुल ...
अनवर कुरैशी
रायपुर { छ.ग }
नोट :- सभी ब्लागर साथयों से निवेदन है की टिपण्णी पश्चात् भोजन की व्यस्था स्वयं के घर पर है कृप्या भोजन उपरांत ही प्रस्थान करे ..धन्यवाद ...

Monday, August 25, 2008

कलंकित गाँधी !!!

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छत्तीसगढ़ की राजनीती की नई खरपतवार बन कर उभरे राजनांदगाव के पूर्व सांसद , या यूँ कहिये की संसद में सवाल पूछने के बदले घुस लेते रंगे हाथ पकड़े गए व पार्टी से निष्कासित किए गए माननीय सांसद प्रदीप गाँधी जी की पार्टी में पुनः वापसी हो गई है , शायद पार्टी को ये लगता है की उन्होंने अपने कार्यकाल में जो उल्लेखनीय कार्य किए है उनका फायदा पार्टी को हो सकता है ,
इस कलंकित गाँधी के राजनैतिक जीवन की बात की जाए तो ये बड़ा ही उतार चढाव भरा रहा , पहली बार डोंगर गावं से विधायक बने प्रदीप गाँधी ने बलिदानी होने का परिचय देते हुए मुख्यमंत्री रमन सिंह के लिए अपनी कुर्सी छोड़ दी , रमन सिंह भी पीछे नहीं रहे उन्होंने आशीर्वाद सवरूप प्रदीप गाँधी को राज नांदगावं लोकसभा की टिकिट थमा दी , गाँधी जी की किस्मत इतनी बुलंद थी की वो सांसद भी बन गए , सपना था ...केन्द्र में मंत्री बनने का ? लेकिन क्या करें ...किस्मत फ़िर पलट गई ...माननीय सांसद जी इस बार स्टिंग ओपरेशन का शिकार हो गए ...फ़िर क्या था ...टी.वी.में घुस लेते दिख जाने के बाद
उनका राजनितिक जीवन मिस्टर इंडिया की तरह गायब हो गया !!!
लेकिन इस दूसरी पारी में मिस्टर गाँधी नए तेवर नए कलेवर में नज़र आ रहे है , छोटी कद काठी , गठीला बदन , माथे में तिलक , और मुह में पार्टी के लिए निष्ठा से भरे शब्द !
प्रदीप गाँधी को उनकी इस दूसरी पारी में पार्टी ने उन्हें चुनाव नियंत्रण कक्ष का प्रभारी बनाया है , हलाँकि इसके लिए गाँधी जी को काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी है लेकिन फ़िर भी किसी तरह कलंकित गाँधी अब पार्टी में है , पार्टी इतना तो ज़रूर जानती है की हमाम में सब नंगे है लेकिन उसे ये भी पता है की जिसकी नंगी तस्वीर छप जाए उसे ही असली नंगा कहा जाता है !
चलिए ये तो हुई एक कलंकित गाँधी की ..देश में एसे ना जाने कितने गाँधी है जिनकी अभी तक कोई नंगी तस्वीर नहीं छापी है , और वो समाज में सफ़ेद पोश नकाब ओढे हुए लोकतंत्र को बेच रहे है ? और बेचते ही रहेंगे ..जब तक हम नहीं जागेंगे ...जब तक हमारे देश को ये भूलने बिमारी से छुटकारा नहीं मिलेगा तब तक इस तरह के गाँधी पैदा होते रहेंगे ..हमे इस तरह की बेवजह हुई खरपतवार को जड़ से उखाड़ फकने की ज़रूरत है ज़रा सोचिये ....
*** अनवर कुरैशी द्वारा जनहित में जारी .....

Saturday, August 23, 2008

लूट सको तो लूट लो ...

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फोकट का सामन है भैय्या ,


लूट सको तो लूट लो !


खुली हुई दूकान है भैय्या ,


लूट सको तो लूट लो !!


ना इसमें कोई मिर्च है , ना है कोई मसाला ,


ना अखछर की पहचान है इसमें !


ना शब्दों की वर्ण माला ,


बिखरा हुआ सामन है भैय्या ,


लूट सको तो लूट लो !!


गुमसुम गुमसुम चुप बैठा है ,


कोई नहीं है सुनने वाला !


कूड़ा करकट दान है भैय्या ,


लूट सको तो लूट लो !!


सोने की चिड़िया के तुमने ,


पर क़तर डालें है ,


भारत का तुम भोग हो करते ,


और नेता कहलाते हो ,


काब तक लूटोगे देश को ,


मेरा कहा अब मान लो ,


पूरा पाकिस्तान पड़ा है ,


लूट सको तो लूट लो ......

Thursday, August 21, 2008

पत्नी केयर टेकर पति उसका मालिक ?

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स्त्री के अनेक रूप हम सभी ने अपने जीवन में देखे है , माँ , बहन , पत्नी , बेटी , ये सभी पात्र पुरूष के जिवन से होकर कभी ना कभी ज़रूर गुज़रते है , और ये सभी जीवन में एक विशेष महत्व रखते हैं , स्त्री हमेशा से ही बलिदान का वो चहरा रही है जिसने हालात के साथ ना जाने कितने समझौते किए है , बेटी रही तो पराई रही , पत्नी हुई तो बहु बन गई , और माँ बन कर बच्चों के भविष्य के लिए समझौते !

पुरूष प्रधान समाज में आज भी स्त्री की जगह उस कोने में है जहाँ से सिर्फ़ झाँका जा सकता है या किन्ही फैसलों को सुना जा सकता है चुप्पी साधे हुए , जहाँ उन्हें फैसलों को मानने की बाध्यता होती है , बिना उनकी बात सुने बगेर , ये हालत भारत के उस सत्तर प्रतिशत छेत्र में है जहाँ ग्रामीण आबादी बस्ती है ,
पुरूष के जिवन का एक पात्र { पत्नी, वैसे सभी पात्र प्रभावित करते है } वास्तव में प्रभावित करने वाला है , पराई बेटी से जब पत्नी बनके किसी पुरूष के जिवन में प्रवेश करती है साथ ही वह बहु कहलाने लगती है तब परिवार की सारी जिम्मेदारियों का भोझ भी उस अबला नारी पर ही होता है , कुल मिलकर परिवार से लेकर पति तक केयर टेकर की भूमिका में पत्नी होती है जिसका मालिक उसका पति होता है ?

वैवाहिक जिवन में पुरूष को वो सारे संवैधानिक अधिकार प्राप्त होते है जिसमे पत्न्नी द्वारा पति को वो सारे सुख जिसकी वो अपेक्षा रखता है नहीं मिलने पर पत्नी को प्रताड़ित किया जा सकता है या यूं कहिये मानसिक रूप से विकलांग पुरूष अपनी नंपुसकता का परिचय देते हुए पत्नी को प्रताड़ित करता है , जिसमे पत्नी की भूमिका सहने मात्र की होती है , अपने मूल अधिकारों से अज्ञान स्त्री !

दूसरी तरफ़ हालत कुछ बदले बदले से है भारत चाहे वो तीस प्रतिशत आबादी जो शहरों में बस्ती है अपने अधिकारों से पुरी पुरी तरह वाकिफ है , वो पीछे नहीं साथ मिलकर चलना चाहती है ...कुछ तो मर्दों से आगे भी निकल गई है , कभी मर्दों के नीचे दबी कुचली औरत अब मर्दों के ऊपर आने लगी है , ये विश्वास उन महिलाओं में है जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है , जो किसी भी रूप में मर्दों से पीछे नहीं है , वो कंधे से कन्धा मिलकर चलना चाहती है ,

बड़ी ही अजीब विडंबना है , जिस देश में स्त्री को देवी की तरह समझा जाता है और उसकी पूजा की जाती है उसी देश में स्त्री घरेलू हिंसा का शिकार हो रही है , या फिर के टोनही होने के शक में उसे पुरे गावं में नंगा करके घुमाया जाता है , किसी ना किसी बहाने से स्त्री पर अत्याचार होता रहता है ॥लेकिन स्त्री अपने होटों को सिले सारे अत्याचारों को सहती रहती है

इक्कीसवीं सदी में भी समाज या के पुरुष की सोच में स्त्री के प्रति कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है शहरी छेत्रों को छोड़ दिया जाये तो ग्रामीण इलाकों में आज भी स्त्री को पुरुष अपनी खरीदी हुई जागीर समझता है , अपने अधिकारों से अनजान स्त्री प्रताड़ना का शिकार होते रहती है लेकिन उसकी सुनने वाला कोई नहीं होता है ,

समाज की नज़र से देखा जाये तो स्त्री "पत्नी " की भूमिका पुरुष "पति " के लिए एक केयर टेकर की होती है जिसका मालिक उसका पति होता है !!!

Sunday, August 17, 2008

मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहता हूँ !!!

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पापा कहते है बड़ा नाम करेगा , बेटा हमारा ऐसा काम करेगा , ...मगर ये तो कोई न जाने के मरी मंजिल है कहाँ ....


इस गीत को जिस किसी ने भी लिखा है सच में बहुत खूब लिखा है , हर पिता का सपना होता है के उसका बेटा पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बने , खूब नाम कमायें , कोई डाक्टर कोई इंजिनियर या कोई बिज़नेसमेन बने , मेरा भी एक सपना है .... मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहता हूँ ...





अब आप सोच रहे होंगे की मैं माधुरी दीक्षित ही क्यों बनना चाहता हूँ ???...माधुरी दीक्षित को देश का बच्चा बच्चा जानता है , हर किसी के दिलों की धड़कन है माधुरी दीक्षित , फ़िल्म जगत में उन्होंने खूब नाम कमाया है , यहाँ तक के उनके नाम की फ़िल्म तक बन गई है ....मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूँ ... विदेशों तक उनके नाम का चर्चा है उनके नाम से न जाने कितने उत्पाद बिकते है और मुनाफा काटते है , जिनके नाम पर कसीदे पढ़े जाते है वो माधुरी अगर मैं बनना चाहता हूँ तो इसमें हर्ज ही क्या है ?








दूर जाने की ज़रूरत नहीं है हमारे देश में ही देख लीजिये ....हमारे देश के महान चित्रकार, जिनका है विवादों से सरोकार, जिनकी उम्र है सत्तर के पार , फिर भी माधुरी के नाम से उनके दिल में बजती है गिटार , मकबूल फ़िदा हुसैन साहब ...जब माधुरी दीक्षित को अपने दिल से लेकर अपने केनवास में जगह दे सकते है तो इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है की माधुरी दीक्षित की क़द्र करने वालों की कमी नहीं है ,





धक...धक ...करके दिल धड़काने वाली माधुरी दीक्षित का जीवन सही मायने में सफल जीवन है , बॉलीवुड में अपने नाम का परचम लहराने वाली ये अदाकारा अपने निजी जीवन में भी एक सफल नारी है , इसमें कोई दो राये नहीं है , उनके समझदारी भरे इस फैसले से भले ही देश के नव जवानों के दिलों को ठेस पहुंची है लेकिन माधुरी का जीवन एक सफल जीवन है ,








अब आप ये सोच रहे होंगे के मैं ...गाँधी ॥नहरू या भगत सिंग क्यूँ नहीं बनना चाहता हूँ ??? क्यूँ भाई साहब मरवाना चाहते हो क्या ? इनके विचारों की कद्र करने वाला कोई रह गया है क्या ? आज अगर इन सब की बात सामाजिक रूप से की जाये तो लोग बहरूपिया समझते है , मज़ाक बनाते है , कहते है देखो ... आ गया ... आदर्शों की बात करने वाला ... गाँधी की छठी औलाद ?हलाँकि ये ओहदा बेहद गर्व पहुँचने वाला है ...लेकिन क्या करे १० की भीड़ में खुद को अकेला महसूस करते है , कौन सुनेगा हमारी बात ...अब किसी को इसमें भी हमारी कोई कमजोरी ढूननी है तो ये ही सही ....








लेकिन ज़रा सोचिये ....अगर सच में ये माधुरी दीक्षित का ब्लाग होता तो क्या होता ? कितने लोग इसे चाहने वाले होते ? कितने लोग हर बात पर वाह वाह करते ? कितनी टिप्पणियां भेजते ? मगर ये क्या ये किसी माधुरी दीक्षित का ब्लाग थोडेही न है , ये तो अनवर कुरैशी का ब्लाग है .... इसलिए .........मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहता हूँ ...

Saturday, August 16, 2008

देश की बदलती राजनीति की नई तस्वीर !!!

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देश बदल रहा है , देश की राजनीति भी बदल रही है , कभी नेताओं की पहचान खादी से हुआ करती थी लेकिन अब स्वरुप बदलता जा रहा है , कभी नेता जनता की आवाज़ हुआ करता था अब भीड़ में एक चर्चित चहरा बन कर रह गया है , अब का नेता आदर्शों की बातें नहीं करता , वो दूसरो पर कीचड़ उछालता है !
जब से देश की राजनीति सत्ता मात्र की पहचान बनी है तब से राजनीति के मायने ही बदल गए है , अब सत्ता के लिए राजनितिक पार्टियों को किसी भी चीज़ से परहेज़ नहीं है ,पार्टियाँ कभी बाहुबल का सहारा लिया करती थी , अब बाहुबलियों के सहारे सरकार चलाती है , जो कभी अपराधी हुआ करते थे अब उन्हें सम्मानित कहा जाता है , सत्ता की लगाम उनके हाथों में है जो ख़ुद बे लगाम है , क्या देश का भविष्य इन बाहुबलियों के हाथ में है ?
ये तो उनकी बात हुई जो कभी हत्या , लुट , फिरौती , अपरहण , जैसे कारनामें करके राजनीति में आयें है अब ज़रा उनकी भी बात कर ली जाए जो एक रंगीन सपनो की दुनिया से हकीकत की ज़मीन उतरें है लेकिन मंजिल का उन्हें भी कोई अंदाजा नहीं है , ये हैं बॉलीवुड के वो सितारे जो सिनेमा के रंगीन पर्दे पर जनता को हसीन सपने दिखाते है , ये वो हसीन चहरा है जो पर्दे पर हर रोज़ बिकता है , अपनी अदाओं से दिल जीत लेते है , अपने हुस्न से दीवाना बना देते है , ये इनका पेशा है अपने पेशे में ये बखूबी से उतर जाते है , लेकिन क्या ये जनता के दर्द को समझ सकेंगे ? उनकी परेशानियों का एहसास है इनको ? कब तक ये जनता की आखों यूही धुल झोकते रहेंगे ???
पार्टियाँ चाहे जो भी हो , बॉलीवुड के सितारों की जमात हर जगह है , ये अपने फ़र्ज़ के साथ कितना इन्साफ करते है ये सभी जानते है ? चाहे बात धर्मेन्द्र की हो या गोविंदा की , या अन्य किसी अभिनेता से बने नेता की ...सभी की एक ही परेशानी है ...वक्त नहीं है ?
जनता ने इन्हे अपना प्रतिनिधि तो बना दिया लेकिन भूल गए की रंगीन सपने सिर्फ़ पर्दों पर ही अच्छे लगते है , इन जनप्रतिनिधियों को शायद ये भी ना पता हो के संसद निधि कहाँ पर खर्च की जाती है या की जाती भी है या नहीं ? जनता ने जब इनको संसद तक पंहुचा ही दिया है तो फ़िर वापस अपने छेत्र में क्यूँ देखना चाहती है ???
दक्षिण में फिल्मी कलाकारों को भगवान् की तरह पूजा जाता है जहाँ की राजनीति रंगीन पर्दे से हो कर गुज़रती है , जहाँ जो कलाकार की ज़ियादा फिल्में हिट है वो उतना बड़ा नेता बन जाता है , अब तो ये भी ख़बर मिल रही है की फिल्मों की दुनिया से निकल कर अपने राज्य जी जनता का दुःख दर्द बाटने के लिए चिरंजीवी भी एक पार्टी बनने जा रहे है , ये तो वक्त ही बताएगा की उनकी कितनी फिल्में हिट है ???
देश की राजनीति की इस नई तस्वीर में वो चहरे भी शामिल है जो यूवा है कुछ कर गुजरने की चाहत भी रखते है लेकिन संसद के शोर में उसकी आवाज़ कहीं दब कर रह जाती है ,
उनको सुनने ही ज़हमत कोई नहीं उठाना चाहता है , उनके विचार तो है लेकिन पार्टी की गाइड लाइन से भटकने का अंजाम भी वो जानते है ???
इन सब के बीच सभी पार्टियाँ अपनी अपनी गिनती बढाने में लगी हुई है , उन्हें इससे मतलब नहीं है के जीतने वाला कौन है बस गिनती बढ़ना चाहिए , क्या पता कब विस्वास मत के लिए उनकी ज़रूरत पड़ जाए ? जनता तो बेचारी मासूम है किसी के भी बहकावे में आ जाती है , चिकना चहरा , एक दो फिल्मी डायलाग , और क्या वोट तुम्हारा ???
आज ये सोचने की ज़रूरत है की आधी बोतल शराब से या फ़िर के कुल्हे मटकाते किसी कलाकार के हाथों में क्या हम देश की बाग़ दौड़ सौपने जा रहे है ? क्या इस देश की कमान उनके हाथों में होंगी जिनके ख़ुद के हाथ खून से रंगे हुए है ? क्या यही लोकतंत्र है ? अगर हाँ ... तो तमाशा देखते देखते हम ख़ुद एक दिन तमाशा बन जायेंगे और लोकतंत्र की हत्या और बलात्कार होते देखने में ज़ियादा वक्त नहीं लगेगा ???

Friday, August 15, 2008

ऐं ज़िन्दगी ...

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ऐं ज़िन्दगी ,

तू मुझे कहीं दूर लेके चल !

जहाँ सिर्फ़ मैं हूँ , और मेरी तन्हाई हो !

न कोई रौशनी , न कोई परछाई हो !

ऐं ज़िन्दगी तू मुझे कहीं दूर लेके चल !!

मुझे दुनिया का नहीं , अपनों से डर है ,

हज़ार चहरे है लेकिन , हमदर्द कोई नहीं है !

कुछ है अगर तो सिर्फ़ मेरी तन्हाई है ...,

ऐं ज़िन्दगी , तू मुझे कहीं दूर लेके चल !!

अब तो ये आरज़ू है के मैं गुमनाम हो जाऊँ ,

न किसी के ज़िक्र में आऊं न ज़हन में आऊं !

न किसी को खोने का ग़म हो , न पाने की हसरत ,

बस लगता है , खामोशी से ज़मी ओढ़ के सो जाऊं !!

ऐं ज़िन्दगी , तू मुझे कहीं दूर ...लेके चल ......

Wednesday, August 13, 2008

मेरे मन को भाया , मैं कुत्ता काट के खाया ...

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दिल्ली में लावारिस कुत्तों को खाना खिलने पर जुर्माना किए जाने की ख़बर ने मुझे कुत्तों पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है , अब बेचारे वफादार इमानदार बेजुबान लावारिस कुत्तों का क्या होगा ? खाना नहीं मिलने पर वो कहीं भूक हड़ताल पर तो नहीं बैठ जायेंगे ? इस तरह से लावारिस कुत्तों पर खाना बैन करना कितना उचित है ? कहाँ है मेनका गाँधी ?

चलिए ये तो बात हुई देश की राजधानी के कुत्तों की बात , अब बात करते है राज्य के कुत्तों की , छत्तीसगढ़ को तो आप जानते ही होंगे ? अरे वोही जहाँ नक्सली पाए जाते है ? पहचाना ? हम्म ...अब ठीक है .... अब आगे बढ़ते है ............. छत्तीसगढ़ के सबसे प्रभावित नक्सली छेत्र बस्तर में केन्द्र सरकार ने नक्सलियों से निपटने के लिए बहुत सी बटालियन भेजी थी , जिसमे सी आर पी ऍफ़ , नागा , मिजो ,आदि शामिल है , जिसमें से कुछ अभी भी मौजूद भी है .... अब मुद्दे पर आ जाया जाए ..... अपन है झोला छाप पत्रकार , खबरों की छानबीन करते रहना है अपना काम , एक दिन झोला उठाके चल दिए बस्तर , वहां हमे नागा बटालियन के केम्प में जन था , तो चल दिए ...... जैसे ही कैंप के मुख्य द्वार पर पहुंचे ... एक नागा के सज्जन टू स्टार ने हमारा स्वागत किया , हम गाड़ी से उतर के उससे बात कर ही रहे थे की अचानक हमारी नज़र जंगल की तरफ गई , दूर जंगल की तरफ़ से नागा के पाँच- छे जवान छोटी कद काठी , गठीला बदन , हाथों में फरसा नुमा हथियार चार जवान एक एक टांग पकड़े लिए आ रहे है किसी की ? पहले तो कुछ समझ में नहीं आया ? क्या है ? धीरे धीरे जवान नजदीक आने लगे तस्वीर कुछ साफ़ होने लगी ...अरे ...हिरन .....नहीं यार ... क्या है ये ....????.....तभी साथ में खड़ा टू स्टार उन जवानों से अपनी भाषा में कुछ कहता है ...मुझे समझ में नही आया ? लेकिन लगा के उन्हें वहीँ रुकने को कह रहा है ? लेकिन तब तक वो जवान नजदीक आ गए थे ...अरे ये क्या ?????.... कुत्ता ......

ये तो आखों देखा हाल है , बस्तर के लोगों ने मुझे एसा वाक्या सुनाया के हँस हँस के पेट दुखने लगा ... आप भी सुनेगे ....अच्छा लो ... एक बार हुआ क्या के ..नागा के कुछ आठ - दस जवान एक कुत्ते के पीछे लग गए ...कुत्ता सयाना था वो जनता था ये नागा भाई लोग है छोडेंगे नहीं , वेसे भी बस्तर के कुत्ते नागा बटालियन को देख के भागने लगते है , अब वो भी भगा खूब भगा ... नागा भी भागे खूब भागे ... भागते भागते नागा भाइयों ने कुत्ते को घेर लिया ... कुत्ता परेशान अब क्या करे ??? जान खतरे में है ... पास में ही एकसे से , से जान बचने के लिए कुवें में कूद कर आत्महत्या कर ली ...लेकिन नागा बटालियन के हाथों नहीं आया .....

अब बस्तर में ये हालात हैं की जहाँ जहाँ नागा बटालियन थी वहां वहां कुत्ते नहीं पाए जाते है , लेकिन जिस समस्या से निपटने के लिए ये बटालियन आई थी वो तो वेसे की वेसी ही है , कुत्ते आज भी नागा बटालियन को देख कर डरते है लेकिन नक्सली नहीं !!!

खैर ... नक्सलियों se ये बटालियन निजाद तो नहीं दिला सकी लेकिन ... किसी चीज़ से ज़रूर दिला सकती है ,

Sunday, August 10, 2008

भारत हमको जान से प्यारा है ...

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मुझे गर्व है के मैं भारत में जन्मा हूँ , वो भारत जिसने बिना किसी भेद भाव के , न किसी जात पात के , मुझे स्वीकार किया है , आज़ाद भारत की आज़ाद हवाओं में खुली साँस लेकर मेरी छाती और भी चौड़ी हो जाती है , मेरा बचपन इसकी सोंधी मिट्टी के बीच गुज़रा जिसकी खुशबु से आज भी देश महकता है , वो भारत जिसकी छाती पर किसान अपने माथे का पसीना बहा कर फसल उगते है , वो भारत जिसकी मिट्टी को जवान अपने माथे से लगते है , वो भारत जिसने कभी हिंदू मुस्लिम सिख इसाई का भेद नहीं किया , वो भारत जिसकी शान में कहते कहते न जाने कितने बरस बीत जाए ... उस भारत की ज़मी , मेरी कर्म भूमि , सच में मेरी जान है , मेरी हर साँस , मेरे देश , तुझपर कुर्बान है !

मुझे अफ़सोस है , मेरे देश को ये किसकी नज़र लग गई है , देश के रखवाले ही देश का सौदा करने में लगे है , मेरे अपने ही मेरे खून के प्यासे हो गए है , पहले तो ऐसे नहीं थे , किसने उनके दिल में ये ज़हर घोल दिया है , कभी मन्दिर की घंटियाँ , अज़ान सुना करते थे , अब ये चीख पुकार , दर्द कहार , ये आंसू जिंदगी में कैसे आ गए , कोई तो है जो अब भी हमे जुदा करना चाहता है कुछ अपने भी है और कुछ पराये भी , आख़िर कौन है वो ???
जिसकी साजिश का हम शिकार हो रहे है , वो भी अपने ही है लेकिन अपने स्वार्थ के तले इस कदर दब गए है के ख़ुद के अस्तित्व को बचाने के लिए हमे अलग करना चाहते है ,
मुझे कुछ नहीं चाहिए ...... बस मुझे मेरा भारत लौटा दो ...जिस पे मुझे गर्व है ....

भोक्वाये ब्लागर कृप्या ध्यान दें .....

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1. क्या आप के ब्लॉग को कोई नहीं पढ़ रहा है ?



२ क्या पढ़ने के बाद कोई टिपण्णी नहीं कर रहा है ?



३ क्या आप को लगने लगा है के आप को लिखना नहीं आता है ?
४ क्या आप को लगता है के आप से अच्छा स्त्रियाँ लिखती है ?



५ क्या आप को लगता है के सारी टिप्पणियाँ स्त्रियाँ ही ले जा लेती है ?



६ क्या आप सोचते है के आप स्त्री होते तो ही अच्छा होता ?
७ क्या आप सारा गुस्सा की बोर्ड पर ही उतार रहे है ?
८ क्या आप हीन भावना से ग्रस्त हो रहे है ?



९ क्या आप को किसी को काटने का मन करता है ?



१० क्या आप भोक्वा गए है ???



*** ऐसे लोग निराश ना हो ? तुंरत मिले ...किससे ? ...डाक्टर राज ...डाक्टर साहनी ...डाक्टर मुल्की ...से नहीं भाई साहब ... किसी दुसरे भोक्वाए ब्लागर से ...और अपने मन की ज्वाला ठंडी कर लें ...सुना है के बदन में जब आग लगी होता है तो पता नहीं धुवाँ कहाँ कहाँ से निकलता है ? एक दुसरे को टिपण्णी देकर पिछवाड़े में पानी डालिए ...



*** इससे भी रहत न मिले तो एक और नुस्खा है मेरे पास ? अब मैं कौन ??? मैं भोक्वा राम रहीम बिना मुछी दाढ़ी का मुल्ला ... बिना धोती कुरते का पंडित ...नाच न जानू और आँगन टेढा ... फोकट में सलाह बाट्ता भूके पेट ही सो जाता ...नुस्खा लो .....



१ नर से बन जाओ तुम नारी ...लिंग अपना स्त्री कर लो ...



२ सोलह सोलह श्रृंगार करके ...अपनी छवि को जोड़ लो ...



३ सेक्स सेक्स की बाते लिखना ...मर्दों को तुम गली बकना ...



४ बिना कुछ जाने पहचाने ... किसी के फटे में टांग आड़ाना .

५ कर लेना तुम सब को वश में ... बुड्ढों की भी टिपण्णी पाना ...


६ एक से चार चार तक ... सारे खम्बो को हिलाना ...


७ और कभी अगर दुखती नस पर ...हाथ तुम्हारे रखदे तो ...


८ असंसदीय भाषाओं से ... उसका बैंड बजा देना ...


९ क्या बुड्ढे क्या यूवा ... सब तेरा साथ निभाएंगे ...


१० एक एक करके ये सारे .... खूब टिप्पणीयाँ करते जायेंगे ....

खूब टिप्पणीयाँ करते जायेंगे .....खूब टिप्पणीयाँ करते जायेंगे ...............

********************************************************************

नोट :- बाप भाई लोग ... नाराज़ नहीं होनेका है ... खाली टाइम में कोई काम नहीं था तो ये बकवास कर डाली ... बुरा नहीं मानने का है ..ठीक .... इंजॉय सन्डे ...

Saturday, August 9, 2008

चिकनी चिकनी प्यारी प्यारी ...

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दुबली पतली नाज़ुक नाज़ुक
चिकनी चकनी प्यारी है ,
गोल गोल सी बड़े बड़े से
हाथों में नहीं आती है ,
छोटा सा एक छेद है बीच में
उसमे ऊँगली भी नहीं जाती है ,
लेकिन प्यारी सच कहता हूँ
कितने रंग दिखाती है ,
जैसे ही आता है चुनाव
तेरी मांग बढ़ जाती है ,
अपने इस छोटे से बदन में
बडों बडों को समाती है ,
करती है जब तू अंग प्रदर्शन
सब के होश उड़ाती है ,
बड़े बड़े नेताओं को तू
नंगा करते जाती है ,
तेरी सात रुपयों की कीमत
सात लाख हो जाती है ,
टीवी चैनल में तू दिख के
उसकी शोभा बढाती है ,
सारे नेताओं की किस्मत
तेरे अन्दर ही समाती है ,
अगर कभी तू दिख जाती है तो
सब का बैंड बजाती है ,
सच कहता हूँ प्यारी सी.डी. तू
कितने रंग दिखाती है ...

Friday, August 8, 2008

खबरी चैनलों की माँ की ..बिप ...

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देश में खबरी चैनलों की तादात इस तेज़ी से बढ रही है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है के अपने आप को सबसे तेज़ कहने वाला चैनल भी पीछे छुट गया है ? लगातार चैनल आ रहे है और बहस का मुद्दा भी बन गए है , संपादक स्तर के लोग टीवी न्यूज़ चैनलों को अपने संपादकीय में स्थान दे रहे है और जी भर के माँ बहन एक कर रहे है , ये बुद्धिजीवी न्यूज़ चैनल को या तो बिन बिहाई माँ समझते है या वो वैश्या जो सरे बाज़ार अपने जिस्म को बेचती है ? बिना अपने अन्दर झांके दूसरो पर कीचड़ उछालने का काम बखूबी करते है , शायद सोचते होंगे उसकी शर्ट मेरी शर्ट से सफ़ेद कैसे ???
और तो और एक बड़ा सा ब्लॉग भी बना दिया गया है मीडिया की .. बिप.. मारने के लिए , जिसका जी करे उतारो और ..बिप .. मार लो ? ..बिप.. मारने का मौका कोई भी नहीं छोड़ना चाहता है इसके लिए सब को जल्दी पड़े रहती है , सबसे बड़ा सवाल ये है की हम अच्छी चीजों को आसानी से नहीं अपनाते है लेकिन बुराई को अपनाने में हमे ज़ियादा वक्त नहीं लगता है .... मुंबई का डॉन कौन ..भिकू भाई ..बोलने में टाइम नहीं लगता है ..लेकिन किसी फिल्म में बुराई पर अच्छाई की जीत किस तरह हुई ये भूल जाते है ?
चलिए में सीधे अपनी औकात में आ जाता हूँ बात न्यूज़ चैनलों की हो रही थी ... जो दिखता है वो बिकता है ..और देखने वाला ..बिप .. है जो उसे देखता है , अब अगर आप देख रहे हो उस चैनल की टी आर पी बढा रहे हो तो वो न्यूज़ चैनल क्या करे ? ..बिप.. कौन है चैनल या हम ? हमे की बलात्कार से पीडित महिला की न्यूज़ का रीक्रिएशन देखना अच्छा लगता है , हमे नाग नागिन की रास लीला देखना अच्छा लगता है , शेर और शेरनी का इश्क हमे अच्छा लगता है ,
..बिप.. भुत ..और भभूत .. के हम तो दीवाने है जब भी दिखाओ हम देखेंगे ?
देखेंगे भी और गली भी बकेंगे , आप देखना बन कर दो वो दिखाना बंद कर देंगे ? में कोई खबरी चैनलों की पैरवी नहीं कर रहा हूँ में ये बताना चाहता हूँ की हम ये देखते है इसलिए ये देखने को मिलता है क्यूंकि ये हम देखना चाहते है , उनकी टी आर पी बढा रहे है और वो नंगा नाच कर रहे है ,
मुझे ख़बरों का सब से बड़ा बलात्कारी चैनल इंडिया टीवी लगता है और रजत शर्मा सबसे बड़ा ..बिप.. बिप.. बिप ..बिप ..बिप .. है लेकिन क्या करे चैनल टी आर पी में नम्बर वन है , देश में अच्छे पत्रकार और पत्रकारिता अभी भी ज़िन्दा है और हमे इसे ज़िन्दा रखना है इसके लिए हमे उन लोगों को प्रोत्साहित करना होगा जो ज़मीन से जुडी पत्रकारिता करते है ,
जैसे एन डी टी वी इंडिया .... खबर वो ही जो सच दिखाए ...

Sunday, July 27, 2008

सूखे पत्तों सी है ज़िन्दगी !!!

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पतझड़ में जब मैंने अपने ,

पच्चीस साल पुरे किये ,

तब टहनियों से टूट के ज़मी पर आया ,

आते ही सामना हवाओं से हुआ

खूब थपेड़े खाए , जिधर उसने चाह बस चल दिए

फ़िर धीरे से बारिश की बुँदे पड़ी

उसने थोड़ा सा सुकून पहुँचाया ,

भिगो करके उसने दी मुझको रहत

सोंधी सोंधी मिट्टी से मुझको मिलाया ,

मैं महकता रहा नई ताज़गी से

सभी को मैं बड़ा रास आया ,
फ़िर सूरज की किरणे जब मुझपर पड़ी

ख़ुद को नहीं मैं उस से बचा पाया ,

उम्र जो मेरी कम को रही थी

सूरज की जलन मैं नहीं सह पाया , जाने का वक्त अब आ ही रहा था

मैं धीरे से खामोशी के साथ हो गया ,

मिल गया मैं जाके फ़िर उसी कुदरत में

जिसने कभी मुझे पैदा किया था ,

मैं ज़मी के अन्दर से दुआ करता रहा

सारा जहाँ फ़िर से रौशन हो गया ,

Saturday, July 26, 2008

सच में बड़ा सुकून पहुचाती हो तुम ...

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जब जब तन्हाइयों में तेरा साथ होता है ,
सच में बड़ा सुकून पहुचाती हो तुम !
कांपते हाथों को तेरा सहारा मिल जाता है ,
लग के होटों से सारी दूरियां मिटाती हो तुम ,
सच में बड़ा सुकून पहुचाती हो तुम !!
वो कांच के टुकड़ों की चुभन ,
और प्यार से गर्दन को सहलाना ,
धीरे धीरे मेरी सासों में समां जाना ,
ले लेना मुझे अपने आगोश में ,
अपने होने का मुझे अहसास कराना ,
हर वक्त याद आती हो तुम ,
सच में बड़ा सुकून पहुचाती हो तुम !!
कभी बन के धुवां आसमान में छाजाती हो तुम ,
ना जाने कितने हासीन चहरे बनाती हो तुम ,
मुझे ले करके किसी हसी दुनिया में ,
हर खुशियों का एहसास कराती हो तुम ,
आखरी दम तक देती हो साथ मेरा ,
मेरी खुशियों के वास्ते जल जाती हो तुम ,
सच में बड़ा सुकून पहुचाती हो तुम !!
{ वैधानिक चेतावनी - सिगरेट पीना स्वास्थ के लिए हानि कारक है }

अब के गिरो तो ज़रा संभल के गिरियेगा !

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चलते चलते अगर आप के कभी पाँव फिसल जाये इससे पहले कोई देखे आप खुद ही संभल जाएँ या अगर ना संभल सके तो समाज के उस चहरे का मज़ाक बनने के लिए तैयार रहे जो आप को कही दूर टक टकी लगाये देख रहे है , जिसे इस बात में मज़ा आ रहा है की वह इंसान सड़क पर फिसल के गिरा हुआ है , बड़ी अजीब सी विडम्बना है लेकिन इस मानसिकता के लोग सड़क पर गिरे इंसान को क्या इतना गिरा हुआ इंसान समझते है की समूह में उसपर हँसा जाता है ?
बड़े ही शर्म की बात है...लेकिन क्या सच में हमे इस तरह के संस्कार मिले है की किसी के गिरने पर हँसा जाये ? तरस आता है मुझे इस तरह के लोगों पर , हसने के और भी बहाने हो सकते है लेकिन किसी की बेबसी पर हँसना कितना जायज़ है ?
बहुत कम ही ऐसे लोग है जो किसी गिरते हुए को सहारा दे , बहुत की कम ऐसे है जो किसी की ज़रूरत के वक्त काम आयें , चलिए किसी गिरते हुए को सहारा ना दे , किसी की ज़रूरत के वक्त काम भी ना आयें लेकिन कुछ तो इंसान होने का परिचय दें , कभी तो उस सड़क पर पड़े पत्थर को ठोकर मारीये जो किसी दुसरे की ठोकर में आयें , किसी को रास्ता ना दिखाएँ लेकिन उसके रास्ते का अड़ंगा ना बने , कैसे इस तरह के लोगों की सोच को बदली जाये के किसी पर हसने से ज़ादा अच्छा ये है के अपना हाथ बढाके उसका सहारा बना जाये , मुझे नहीं मालुम आप ही बताइए ? ना बताना चाहिए तो ज़रा संभल के चलियेगा सड़क पे कई चहरे आप पर टक टाकी लगाये बैठे है ?

Friday, July 25, 2008

समाज की राह देखती रही उसकी लाश !!!

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बड़े ही अफ़सोस की बात है लेकिन ये सच है की इक्कीसवीं सदी में भी हमारे समाज का रूढीवादी चहरा अब भी नहीं बदला है , आज भी लोग अपने द्वारा बनाये गए समाज के तुगलकी फरमानों का शिकार हो रहे है , बात आज की नहीं बीस साल पुरानी है दुर्गा प्रसाद को ये नहीं मालुम था के ये फैसला मरने के बाद भी उसका पीछा नहीं छोडेगा , और उसने एक दलित से प्रेम विवाह कर लिया !
समाज से उसे बेदखल कर दिया गया पूरा का पूरा गावँ उसके विरोध में खड़ा हो गया उसके अपने पराये हो गए , उसके साथ ना कोई बात करता और ना ही कोई उनके घर जाता , ये सज़ा उन्हें दूसरी जाति में शादी करने की मिली , उस वक्त से दुर्गा प्रसाद घीनोने समाज का बदनुमा चहरा रोज़ ही देखता रहा कभी दूकान में कभी सड़क पर या कभी चौपाल पर !
शायद दुर्गा को ले लगा होगा के समाज का मुखौटा लगाए मेरे अपने मुझे एक दिन फिर से स्वीकार कर लेंगे ? लेकिन ऐसा हुआ नहीं, और एक दिन दुर्गा की आत्मा ने भी उसके शारीर का साथ छोड़ दिया , घर में मातम छाया हुआ था दुर्गा प्रसाद की पत्नी परेशान थी क्यूंकि दुर्गा की अर्थी को कन्धा देने के लिए गावं का एक आदमी भी तैयार नहीं था , दुर्गा ने अछूत लड़की के विवाह जो किया था , दुर्गा की लाश यूही घंटो पड़ी रही लेकिन उसे हाथ लगाने वाला कोई नहीं था ,
पूरा का पूरा गावँ तमाशा देखता रहा लेकिन मदद के लिए कोई भी आगे नहीं आया , मरने के बाद भी दुर्गा प्रसाद समाज से बहिष्कृत था फिर किसी तरह दूसरी समाज सेवी संस्था ने उनका अंतिम संस्कार किया !!!

Wednesday, July 23, 2008

बड़ी ख़ामोश सी है ये शाम !!!

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बड़ी खामोश सी है ये शाम,
और तन्हाई का आलम है ,
दखने से लगता है के सब चुप है ,
लेकिन दिल में लाखो सवाल है , कई आरज़ू सीने में दबा राखी है ,
कोई चेहरा नहीं है बयां करने के लिए,
यूँ तो हर वक्त है काफिला सा ,
फिर इतना तनहा में हर वक्त क्यूँ हूँ ,
बे रंग नहीं थी कभी ज़िन्दगी ,
मेरे खाबो ने मेरा रंग चुराया है ,
हारा नहीं हूँ मैं , ज़िन्दगी तुझसे ,
कुछ हालत ही ऐसे है ,
मैं खुद से खफा हूँ !!!

Tuesday, July 22, 2008

उनकी हथेली में लिपटा वो पचास का नोट !!!

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मैं उस दिन खुश था , सोचा चलो आज बाज़ार की सैर की जाए , शाम होते ही मैंने साफ़ सुतरे कपड़े पहने , अपना पसंदीदा डीओ लगाया और निकल गया बाज़ार की तरफ़ ...फ़िर मुझे याद आया मेरा पुराना अज़ीज़ दोस्त जिसकी इलेक्ट्रिकल्स की शॉप है बाज़ार में , बस सोच ही लिया आज की शाम उसके साथ ही बिताना है , पहुचते ही उसने मुझे देखा ..खुश हुआ मैं भी खुश हुआ और हसी ठिठोली करते हुए हम दोनों उस माहोल में ढल गए , उसके ग्राहक आते रहे वो उन्हें निपटता रहा , फ़िर कुछ देर बाद मैंने ४ से ५ लोगों को उसकी दूकान में आते हुए देखा , वो थोड़े डरे सहमे से लग रहे थे शायद किसी पास के गावं से आए थे , उनके कपड़े कुछ गंदे से थे चप्पल थोड़ी पुरानी हो चली थी मोचियों की नक्काशी भी दिख रही थी , लगभग ४० की उस महिला से मेरे मित्र से कहा ....टार्च है क्या ? मित्र ने कहा है ... और टार्च लाने चला गया ...इस बीच वो महिला अपने साथ आए २-३ लोगों से बात करने लगी ... मित्र आया और टार्च दिखाने लगा ...ये १०० का है ..ये ८० और ये ६० का है ...महिला ने कहा इतना महंगा ?? और नहीं तो क्या सस्ता तो लगा रहा हूँ ...लेकिन ये जवाब शायद उस गरीब के लिए ही था ? क्यूँ की इससे पहले वो कुछ साफ़ सुतरे लोगों से अच्छे से बात कर रहा था ? सहमी सी महिला अपने साथ आये लोगों की तरफ देखने लगी .. फिर अपनी हथेली में लिपटे नोटों को गिनने लगी वो पचास रूपये थे , दस फिर भी कम थे , पास खड़ी साथ आई अपनी महिला से उसने दस रूपये लिए और मेरे व्यापारी मित्र को दे दिए ...और हल्की सी मुस्कान लिए दूकान से सभी चल दिए ......मैं दूर बैठा सब कुछ देख रहा था , मुझे लगा के टार्च के कुछ पैसे कम कर देने चाहिए थे मेरे दोस्त को लेकिन उसने नहीं किया... मुझे अपने दोस्त पर बहुत गुस्सा आ रहा था ...लेकिन क्या किया जा सकता था मैं एक व्यापारी की नज़र से उन लोगों को नहीं देख रहा था ... मुझे उस महिला के हाथों में लिपटे हुए पचास के नोटी की कीमत ५०० से भी ज़यादा लग रही थी , कतनी महनत से उसने वो पैसे कमायें होंगे ? या कितनी बचत की होगी टार्च खरीदने के लिए ..उसके पैसो की कदर करने वाला मेरा दोस्त शायद नहीं था , कुछ पैसे कम कर भी देता तो उसका क्या जाता ? लेकिन ये घटना उसे एक अच्छा व्यापारी होने का संकेत ज़रूर दे रही थी, लेकिन मेरा मन विचलित हो गया था , पचास के नोट के पीछे का दर्द मैं उस महिला के चहरे पर देख रहा था , मैं इस बात को बखूबी समझ रहा था की ये पैसा कितनी महनत के बाद कमाया गया है ..इन पैसो में अगर एक रूपये की भी बचत हो जाये तो ये उस महिला के कितने आम आ सकता है इसका मुझे अंदाजा था लेकिन ऐसा हुआ नहीं ....मैं अपनी उदास रात लिए वापस लौट आया ... हाँ इतना ज़रूर है को वो पचास का नोट मुझे आज भी ये याद दिलाता रहता है की उसकी कीमत ५०० से कहीं ज़यादा है ....

Monday, July 21, 2008

कानून के जानकारों मेरी आवाज़ सुनो...

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वकील साहब ,


नमस्कार ........


बहुत समय से मेरे मन में देश के कानून को लेकर कई सरे सवाल दौड़ रहे है ,मैं ख़ुद से सवाल करते करते थक गया हूँ , लेकिन जवाब अब भी नहीं मिला है ,


क्या हमारे देश के कानून से बढ़कर भी कुछ है ???


इसमें तो कोई दो राय नहीं हो सकती है के हमारे देश का कानून लचर है धीमा है फैसलों में कई कई साल लग जाते है लेकिन फ़िर भी फैसले होते नहीं है ? देरी की वजह से साक्ष भी मिटते जाते है , आरोपियों को इसका फायदा भी मिल जाता है वो बच निकलते है ?


लेकिन हमारा कानून कहता है के भले ही १०० आरोपी छुट जायें लेकिन एक बेगुनाह को सज़ा नहीं होनी चाहिए , ये अच्छी बात है बेगुनाह को सज़ा ना हो , लेकिन मैंने जो अपने आस पास देखा है उसमें कई ऐसे मामलें है जिसमें बेगुनाह को आरोपी बना दिया जाता है , जेल में ठूस दिया जाता है , केस चलता रहता है , पेशी आती जाती रहती है , सालों बीत जाते है , अखबारों में खबरें आती रहती है फलां ने हत्या कर दी , बलात्कार कर दिया , पुलिस अपनी ब्रीफिंग में उसके ख़िलाफ़ पुरी कहानी छपवाती रहती है , कुल मिलकर उसकी चरित्र हत्या कर दी जाती है और वह बलात्कारी मानसिकता के सामने बेबस होता है , बेबस इंसान बेचारा क्या कर सकता है ? उसवक्त उसकी कोई सुनने वाला नहीं होता है , { हाल ही में आरुशी हत्याकांड में भी उनके पिता पर कुछ एस तरह के आरोप भी लगे थे }


लेकिन रहत की बात ये होती है की माननीय न्यालय उसे बा इज्ज़त बरी कर देता है , लेकिन क्या फ़िर वो अपनी पुरानी जिंदगी में वापस लौट सकता है ? क्या समाज उसे फ़िर से अपना लेता है ? क्या उसके अपने या उसके आसपास के लोग उसे स्वीकार कर लेते है ? क्या उसकी खोई हुई इज्ज़त वापस आ जाती है { कोर्ट के इस फैसले से क्या इज्ज़त बरी किया जाता है } नहीं साहब नहीं आती है , समाज उसे दुबारा स्वीकार नहीं करता है , उसपर लगा कलंक सारी जिंदगी उसके साथ रहता है , और उसके जीवन को नर्क बना देता है , वो किसी को मुह दिखाने के लायक नहीं रहता है ,
अब वो क्या करे? उसके साथ जो बीता है उसका दोषी कौन है ? अदालत या समाज ? क्या समाज अदालत से बड़ा है ? जो उसे स्वीकार नहीं करता या अदालत के फैसले को नहीं मानता ?या फिर के पुलिस ? जिसने उसका चरित्र हनन किया है ? या के वो पत्रकार या अखबार जिसने ये सब छापा है ? क्यूँ के अदालत से बा इज्ज़त बरी होने की खबर तो उसने नहीं छापी ? दोषी चाहे कोई भी हो ये बात तो तय है की उसकी ज़िन्दगी तो बर्बाद हो गई !

ये हर उस आप आदमी की समस्या हो सकती है जिसने अपराध ना किया हो लेकिन इस तरह की सज़ा सारी ज़िन्दगी भुगत रहा हो ? मुझे जवाब चाहिए , सीधा सादा सा , बिना किसी दावं पेच के , क्या मेरी ज़िन्दगी मुझे वापस लौटा सकते हो ?

Sunday, July 20, 2008

बना दो मुझे भी सांसद एक बार !!!

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मुझे भी एक सांसद बना दो ,
चाहे उसपे हतकड़ीयां लगवादो !
जेल में तुम मुझको सडा दो ,
मुझे भी एक सांसद बना दो !!
कभी आएगी जब मेरी भी बरी ,
खूब करूँगा मैं अपनी खरीदारी
कभी इधर तो कभी उधर लुड़क जाऊंगा ,
जिधर जियादा मिलेंगे वहीँ बिक जाऊंगा
प्रधानमंत्री के घर खाने को जाऊंगा ,
हर तरफ होगा , सिर्फ मेरा बोलबाला
कितने में बिका है ये सांसद साला
गाली भले ही मैं सबकी खाऊँगा ,
एक एक वोट की कीमत लगाऊंगा !!
पार्टी कहे चाहे मुझको दलाल
देश हित में फिर भी बिक जाऊंगा ,
मिलजायेगी मुझको भी एक लाल बत्ती
केबिनेट का मैं भी एक हिस्सा कहलाऊंगा
देश की सेवा में खुद को लगाऊंगा ,
बची कुची खुरचन मैं खुद ही खाजाऊंगा !!
फिर जब आएगी चुनाव की बारी
मिलूँगा जनता से मैं बारी बारी ,
कहूँगा सभी से मैं सिर्फ एक बात
बना दो मुझे फिर से सांसद एक बार !!!
{{{ दिल पे मत ले यार , जो बन जाए सरकार , तो हो गया बंटाधार }}}

Tuesday, July 15, 2008

काजल की कोठरी ???

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देश आज जिस राजनैतिक अनिश्चिताओं के दौर से गुज़र रहा है , इन्ही सब के बीच ये भी ख़बर आ रही है के सरकार बचाने के लिए यू.पी.सांसदों की खरीद फरोख्त में लगा हुआ है ? ये कह रहे है ए.बी.वर्धन !
क्या सच में हमारे देश के संसद बिकाऊ है ? क्या उन्हें ख़रीदा जा सकता है ? हालाँकि एक बार टीवी पर देखा था कुछ लेते -लेते , लेकिन सभी ऐसे होंगे ? कुछ नही भी , काजल की कोटरी में काला होना तो लाज़मी है ? लेकिन वर्धन साहब ने कहा है तो कुछ सोच समझ कर ही कहा होगा ? उनका पुराना तजुर्बा हो सकता है ???
लेकिन अगर ये सच है तो ये सच, सच में बहुत ही शर्मनाक है ? देश का प्रतिनिधित्व करने वाले अगर बिकाऊ हो जायेंगे तो देश का क्या होगा ? और वेसे भी देश की फिकर है भी किसको ?अगर एक सांसद बिकता है तो वह किस श्रेणी में आता है ..देश द्रोह या देश हित ? बिका तो सरकार बच सकती है ? चुनाओ का भोझ गरीब जनता पर न पड़े हो सकता है इसका ख़याल सांसद जी को हो ? एक बात तो है हमारे देश मैं सब कुछ बिकाऊ है बस इन्तेज़ार है तो एक अच्छे खरीददार की , जो हमे खरीदते हुए अपने बदन में कोई कैमरा ना छुपा रखा हो ???
लेकिन ये तो सच है की जिस तरह से ये खबरें आ रही है कि सरकार बचने के लिए सांसदों कि खरीदी कि जा रही है , कुछ सांसदों को तो जेल से भी निकला जा रहा है एक वोट के लिए , जिन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई है, ये देश कि गन्दी राजनीति का एक चहरा है ? पता नहीं इस दलगत राजनीति के और कितने चहरे दिखेंगे ?लोकतंत्र की ये मिसाल एक काजल की कोटरी बन के रह गया है ? अब इसमें कुछ साफ़ सुत्रि छवि के लोग भी होंगे तो इससे खुद को कैसे बचायेंगे ???

Wednesday, July 9, 2008

क्यूँ ना मैं आत्महत्या कर लूँ ???

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वो शाम का वक्त था , मैं से ज़माने की भागदौड़ से कही दूर तनहइयो में बैठा, अपनी ज़िन्दगी का हिसाब किताब कर रहा था, सोच रहा था के मैंने इस दुनिया में क्या खोया और क्या पाया ???डूबते हुए सूरज की लों मेरी आखों से टकरा रही थी, और मेरे आंसू मेरी आखों का साथ छोड़ रहे थे, मन में हजारों सवाल दौड़ रहे थे, मेरे साथ ही ऍसा क्यूँ हुआ ? हमेशा मेरे साथ ही ऍसा क्यूँ होता है ? भगवन तुम ने मेरे साथ ऍसा क्यूँ किया ? फिर अचनक मेरे मन में एक सवाल आया ? क्यूँ ना में आत्महत्या कर लू ???मेरे पल भर के इस फैसले ने मुझे कुछ सोचने को मजबूर कर दिया ? अगर में मर गया तो क्या होगा??? मेरे घर में मेरे अंतिम संस्कार की तयारी चल रही है , मेरे बुजुर्ग पिता का चहरा मायूस है उनकी आँखे पत्थर हो गयी है , जिस उम्र में उन्हें मेरे साथ की ज़रूरत है मैने छोड़ दिया है , वो किसी तरहा बस खुद को संभाले हुए है ? बस उन्हें अब इसी ग़म से जीना है,दूसरी तरफ वो जिसने मुझे नाज़ो से पाला,मेरी हर छोटी बड़ी जिद को पूरी करती रही , मेरी हर गलतियों को माफ़ करती रही , बस मुझे खुश देखने के लिए पता नहीं उसने क्या क्या किया , मेरी माँ ...उसके आसूं तो जेसे थमने का नाम ही नहीं ले रहे है , रो-रो के उसने अपना बुरा हाल कर लिया है , उसे अब भी यकीं नहीं है के मै अब इस दुनिया में नहीं हूँ ?? उसे अब भी ऐसा लगता है के मै अभी उठ जाऊंगा और कहूँगा ...माँ... ??? मेरी नादान माँ ??? कितने सपने देखे थे मेरे लिए ? मैंने सब तोड़ दिए.. उनके सरे अरमानो का गला घोट दिया ... ना जाने अब वो इस हादसे को कब भूलेंगी ??? शायद सारी ज़िन्दगी नहीं !कुछ भीड़ सी दिखी , भीड़ के बीच में मेरा मायूस भाई नम आखे लिए मेरे कुछ अज़ीज़ दोस्तों को कुछ बता रहा था ? सब बहुत उदास थे , दुखी थे , सबको मुझे खोने का ग़म था ? बहुत से लोग मुझसे बहुत सी बाते कहना कहते थे ? लेकिन अफ़सोस मैं तो इस दुनिया में नहीं था , मैं दूर खड़ा सब देख रहा था , अपने किये पर शर्मिंदा था , अपने किये की माफ़ी चाहता था , मुझे अपने माता पिता की पीड़ा देखी नहीं जा रही थी , दोस्तों को खोने का ग़म सता रहा था , लेकिन मुझे माफ़ी नहीं मिल रही थी, क्यूँ की मैं इस दुनिया में था ही नहीं !!!इतना सोच मेरा बदन कापने लगा , मैने अपना सर उपर किया तो देखा सूरज डूब चूका था , टिमटिमाते तारे और धुन्दला सा चाँद दिखा, मैंने अपनी नम आखों को पोछा, मुझे अपने उस सवाल पर पछतावा हुआ , और फिर मेरे मन में एक सवाल आया ? मेरी एक ज़िन्दगी कितनी जिंदगियों से जुडी है ? मेरी ज़िन्दगी मेरे लिए ही नहीं दुसरो ले लिए भी है मेरे अपनों के लिए भी है और उनका ये हक मैं उनसे भला कैसे छीन सकता हूँ !!!{{{ यह लेख एक काल्पनिक सत्य है , इस तरह के विचार अगर आप के मन में हो तो कृपा कर इसे निकाल दे , हम आप के आभारी होंगे , }}}

Tuesday, July 8, 2008

एन.डी.ए + यू.पी.ए का गठबंधन ???

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देश में गठबंधन की राजनीति के बदलते समीकरण को देख लगता तो यही है की कुछ देनो में ये खबर आनेवाली है के यू .पी .ए और एन .डी. ए का गटबंधन हो गया है ???
देश की राजनीति में गठबंधन की ये नय्या देश को किधर लेकर जायेगी , या डूबयेगी , इसका अंदाजा लगाना तो कोई मुश्किल कम नहीं है ? मुश्किल इसलिए नहीं है ये तो हमने देखा है एक वोट से सरकार को गिरते ...!!!
अब अचानक से हमारे देश प्रमी नेताओ को देश की याद ४ साल बाद आये या ४० साल बाद उन्हें जब लगता है तो वो देश हित में समर्थन दे देते है ??? खुद बेचारे भले ही कितनी ज़िल्लत उठाए हो ,उसी पार्टी से जिसे अब वो समर्थन करने जा रहे है ??? कभी खदेड़ दिए गए थे ,अब १० जनपद का दस्तरखान उनके लिए ही सजाया जा रहा है ??
चलिए जाने दीजिये राजनीति में हालत बदलते रहते है , जाने दीजिये ??? क्यूँ भाई??? जब वोट मांगने आये थे तो उसी पार्टी की बुराई कर रहे थे , कह रहे थे मुझे जीतादो मैं सब ठीक कर दूंगा ? अब पूरी की पूरी पार्टी ही उस पार्टी से मिला लिए ?? हाँ देश हित ???गुस्सा छोड़ चलो कुछ काम की बाते करते है ...
हमारे देश में चल रही ये गठबंधन की राजनीति या कहे के केकड़े की दोड़ , इसमें जीत किसकी होगी ये किसी को नहीं मालुम लेकिन हार तो हमारी ही होगी ? कुछ किया तो मुसीबत , ना किया तो मुसीबत , हाथ पैर जोड़ते रहो , ५ साल चलने दो , फिर चाहे जो कहलो ???
जब तक देश में एक पार्टी की सरकार ना हो ,और उसे देश हित का धयान हो , तब ही देश का विकास हो सकता है ? नहीं तो हर कोई आयेगा हमे नोचेगा हमे खाएगा बचाकुचा भी लेके जायेगा ,हम यू उल्लू की तरह देखते रह जायेंगे ???
लेकिन इन सब का ज़िम्मेदार कौन है ...हम ??? नहीं तो हमने क्या किया ? देखा के कम चोर कौन है उसे बैठा दिया , अब चोर और चोर तो मौसेरे भाई है ना ???देश में गठबंधन या अस्थिरता देश को कमज़ोर कर रही है , इसका कोई हल निकलना बेहद ज़रूरी है नहीं तो देश हित के नाम पर नेता बिकते रहेंगे , गठबंधन होता रहेगा ,टूटता रहेगा , और हम अपने देश को यूही लुटते हुए दखते रहेंगे ???

पत्नी प्रताड़ित पुरूष संघ जिंदाबाद !!!!!!

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नारी शक्ति जिंदाबाद , नारी पड़ेगी विकास गढेगी , बेटा बेटी एक सामान , सबको मिले सामान अधिकार , ये सुनने में जितना अच्छा लगता है उसका पालन हो ये उससे कहीं ज़दा अच्छा है ? और कुछ हद तक हो भी रहा है ? हमेशा दहेज़ के नाम पर या नारी होने की वजह से प्रतारणा झेल रही नारी को जो कानूनी हक दिए गए है वो भी जायज़ है , लेकिन सोचये अगर उन्ही अधिकारों का नाजायज़ फायदा उठाया जाये तो क्यूँ न बने .....पत्नी प्रताड़ित पुरुष संघ ???????छत्तीसगढ़ में इन दिनों पत्नी प्रताड़ित पुरुष संघ की काफी चर्चा है , ये वो बेचारे हैं जो अपनी पत्नी के मारे है ? पत्नी की प्रताड़ना इतनी झेल चुके है की अब इन्हे ये कहते हुए शर्म भी नहीं आती है ?प्रताड़ित पुरुषों की संख्या लगातार बदती ही जा रही है , इनमें २५ साल के विवाहित पुरुष से लेकर ६० साल तक के भी शामिल है , हर कोई प्रताड़ित है ?? कई तो बेचारे कानूनी दाव पेज में इतने उलझे है की निकल ही नहीं पा रहे है , कईयो ने ज़िन्दगी में पहली बार जेल देखी है ६-६ महीने जेल में रहे है , पूरा परिवार जेल जा चूका है क्या बहन ,माँ बाप , भाई और दूर के रिश्तेदार भी इससे अछूते नहीं है , हुआ क्या ???? पत्नी की एक शिकायत??? पूरा परिवार ही गंगस्टर हो गया ? ६० साल के बुजुर्ग को भी जेल की हवा खानी पड़ती है , जिसने कभी बड़े ही शान से अपने बेटे की शादी की थी ??सवाल है अब क्या होगा ??? पूरा परिवार बर्बाद ?????किसी वक्त प्रताड़ित रही महिलओं को जो कानूनी अधिकार मिले है उनका दुरूपयोग उनके लिए तो फायदेमंद साबित हो सकता है लेकिन उनका क्या जो उस कानून की मार झेल रहा है ?

Monday, July 7, 2008

ये एक अन्न का दाना देगा मुझको मनमाना !!!!!

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आज देश के हालात जिस तरह से बिगड़ते जा रहे है उसे देख के लगता है की वो दिन दूर नहीं जब हमारे देश से गरीबी पूरी तरह से दूर हो जायेगी ?जब गरीब ही नहीं रहेगा तो गरीबी कहाँ रहेगी?लेकिन सच तो ये है की जिस तरह से महगाई अपने पैर पसार रही है उससे लगता नहीं के जल्द ही इसपर काबू पाया जा सकेगा ??मुझे लगता है की से देश की सबसे बड़ी समस्या खाद्य समस्या होने जा रही है ? मूल्य वृद्धि , उपज , या जनसँख्या इसका एक कारण हो सकते है ??? लेकिन सबसे बड़ी समस्या है है उसका असीमित उपभोग?जिस तरह हम लाखो टन अनाज रोज़ खा जा रहे है , ज़रूरत ना हो तो भी खा रहे है , या उसे बर्बाद कर रहे है ,एसे हालत एक दिन हमे कहा लेकर जायेंगे ??? ज़रा सोचये ??आमिरो से मुझे कोई नाराज़गी नहीं है वो तो खरीद लेंगे , लेकिन उनका क्या जो आप भी सिर्फ एक वक्त ही खाकर गुज़ारा करते है ?? अनाज की कमी ही उसकी महंगाई का कारण है ? अगर अनाज असीमित हो तो शायद इतना महंगा ना हो ??? गरीब भी खरीदने की हिम्मत जुटा ले ??? आज भी कितने ऐसे है जो वडा पाओ में गुज़ारा करते है ? * खाद्य समस्या से बचने के किये हमे खुद ही प्रयास करना चाहिए , हमे उतना ही खाना चाहिए जितने की ज़रूरत हो , अगर हम एक रोटी ही बचाते है तो ये समझे के एक रोटी आप के किसी भूके इन्सान को खिलाई है ,अनाज की बचत ही हमे इस समस्या से बचा सकती है ???

Friday, May 30, 2008

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मुझे भी अपनी ज़िंदगी जीने दो ,
मैंने भी आखों में कई खाब सजाए हैं !!!
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भारत के नक्शे मे अगर आप ने कहीं छत्तीसगढ़ को देखा है या इसे जानने की कोशिश की है तो बस्तर का ज़िक्र ज़रुर आया होगा ? बस्तर में रहने वाले आदिवासियो को जानने की उनके जिवनशैली को नज़दीक से समझने की जिज्ञासा हम शहरी लोगों को कुछ ज़यादा ही रहती है , यहाँ तक के विदेशो तक से लोग इनपर अध्यन करने के लिए चले आते है लेकिन इनके दर्द को आज तक शायद ही किसी ने समझा है या महसूस किया है ?
नक्सलवाद की मार झेल रहा बस्तर इन दिनों एक ऐसे विनाश की ओर बढ़ रहा है जिसका अंदाजा न वहाँ रहने वाले लोगों को है और का सरकार को ? नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए चलाये जा रहे सलवा जुडूम का अंजाम इतना भयंकर हो सकता है के कहीं ऐसा न हो के बस्तर से आदिवासियों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए ?
नक्सलवाद से निपटने के लिए सलवा जुडूम का जन्म हुआ , सलवा जुडूम में वो आदिवासी शामिल हुए जो नक्सल पीड़ित थे , गांव के गांव खली हो गए और कम्पे में रहने लगे , लेकिन अब भी बहुत से आदिवासी अपनी ज़मीन अपना घर अपनी मिटटी को छोड़ कर नही रहना चाहते है वो अपनी ही ज़मीन में जीना मरना चाहते हैं ,लेकिन ऐसे आदिवासीयों को अब अपनी मर्जी से अपनी ज़िंदगी जीने अक हक नही है , उनकी आज़ादी में न जाने क्यों ग्रहण लग गया है , गावं में रहते है तो सलवा जुडूम के लोग उन्हें नक्सलियों का समर्थक कहते है ,गावं में रहते है तो नक्सली उन्हें जीने नही देते , गावं में रहते है तो उन्हें कोई भी सरकारी सुविधाएँ नही मिलती है, इतना अत्याचार आदिवासियों के साथ क्यों किया जा रहा है आख़िर उसका कसूर क्या है ? वो भोले भले मासूम अपनी ज़िंदगी अपनी तरह से जीना कहते है लेकिन उन्हें वो भी नही दिया जा रहा है आख़िर उनका दर्द कौन समझेगा ? उनकी आखों में जीने की उम्मीद है , उन्होंने भी कई खाब सजाए होंगे , उन्हें किसी के सहारे की ज़रूरत भी नही है ना ही उन्हें दुनिया की फ़िक्र है , वो जिस हाल में है खश हैं , उनका कोई कसूर नही है ना वो नक्सली है ना वो सलवा जुडूम से जुड़े हुए है और ना सरकार हैं ,
शुक्र है इस हाल में भी उसे जीने की आस है !!!!!!!!!!!!!!

Saturday, May 24, 2008

आई पी एल का दर्द !!!!!!!

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आई पी एल की शुरुवात जिस गर्मजोशी से की गई थी ,अंजाम भी कुछ इसी तरह का सोचा गया था लेकिन जिस तरह से स्टार टीमे सेमी फाईनल तक नही पहुच सकी है इससे टीम के मालिको का दर्द साफ झलकता है !

कभी सोचा नही था की विजय माल्या अपनी टीम को हारते हुए दखे तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी ? किंग खान बिना कुछ कहे सब कुछ कहना चाहते है लेकिन खेल के चक्कर मे वो अपनी हीरो वाली छवि को धूमिल भी नही करना कहते है ,

चाहे कुछ भी हो लेकिन टीम के मालिको का दर्द साफ झलकता है और हो भी न क्यों आख़िर करोडों का सवाल जो है , इस क्रिकेट ने अगर धनकुबेरो के माथे मे पसीना ला दिया है वही खिलाड़ियों की साख भी कम हुई है , सवाल ये है की जिन खिलाड़ियों को इस देश मे भगवन की तरह पूजा जाता है वो सरे बाज़ार ख़ुद को नीलाम कर दिए , बोली लगती रही और क्रिकेट के भगवन बिकते रहे , करोडों के भाव भी मिले , लेकिन जब प्रदर्शन की बारी आई तो शुन्य ???
अब इनपर करोडों खर्च करने वाले इन्हे कुछ बुरा भला कहे तो क्या ग़लत कहे ? आखीर आप को इन्होने ख़रीदा है ये आप के मालिक है बुरे प्रदर्शन मे बुरा बर्ताव तो लाज़मी है ?
वेसे ई पी एल २० -२० से बीसीसीआई को ये तो ज़रुर समझ मे आ गया होगा के पुराना बदल दो और नया ले जाओ ??? क्रिकेट के इस खेल को देश की गरिमा से जोड़ने वाले कम से कम इन नए और उभरते हुए खिलाडियों को देखकर ख़ुद को गोरवान्वित तो मह सुस करेंगे ????

Sunday, May 18, 2008

मैंने चुप रहकर सब कहने की अदा सीख ली है !!!

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कुछ ने मेरे बारे में ये समझ लिया के मैं कुछ नहीं कहता , मेरे बंद होटों को मेरी कमज़ोरी समझने लगे , मैं फ़िर भी चुप रहा , मुझे हर वक्त ये लगता क्या मैं इतना कमज़ोर हूँ ?
किसी की आगे बढ़ने की होड़ ने मुझे पीछे ढकेलने का बखूबी से काम किया , मैं फ़िर भी चुप रहा , मैंने अब सोच लिया है ख़ुद को साबित करने का , मुझे अब ख़ुद को समझना है ,
मुझे अब भी किसी से शिकायत नहीं है , मैं अब भी चुप हूँ लेकिन चुप रहकर सब कहने की अदा सीख ली है !!!

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