Tuesday, December 2, 2008

भारत में और कितने ९/११ ...





महात्मां गाँधी के सिने में लगी ३ गोलियौं ने इस देश से अहिंसा के अध्याय का अंत कर दिया था ? अहिंसा के सबसे बड़े प्रतिक की हिंसा से मौते शायद देश के भविष्य के लिए एक भयंकर संकेत था ? एक वो दिन था और आज भी एक दिन है जब मुंबई में हुए आतंकी हमलों को हम दुनिया का सबसे बड़ा हमला साबित करने पर तुले हुए है ? यहाँ तक की अमेरिका में हुए ९/११ का हमला भी हमे छोटा लगने लगा है , शायद हम ये भूल गए है की किसी भी परिवार के सदस्य की किसी भी आतंकी हमलों में हुई मौत उसके लिए ९/११ से कम नहीं है ? उसका दर्द समझने के लिए किसी ९/११ या मुंबई में हुए हमलों की तुलना करके सम्भव नहीं है , उसकी पीड़ा को तभ ही समझा जा सकता है जब वो परिवार ख़ुद का हो ?
अचानक से हुए इन आतंकी हमलों के बाद से हमारे अन्दर देश भक्ति की एक ऐसी भावना जन्म लेती है जो इस पुरे सिस्टम को बदल कर रख देना चाहती है जो चाहती है की आतंकवाद की जड़ों का सफाया कर दे लेकिन हमारी ये सोच दुसरे ही दिन धुंधली होने लगती है हमे उस मृत शरीर की तेरहवी ही बरसी लगने लगती है ? देश भक्ति की भावना किसी मल्टीप्लेक्स में मिटने लगती है या हर रोज़ की दिनचर्या में हम इतने व्यस्त हो जाते है के स्वयं से अधिक सोचने की हम में छमता ही बाकी नहीं बची होती है ? क्यूँकि को घाव हमारे शरीर का नहीं है उसकी अनवरत पीड़ा का कष्ट हमे नहीं भोगना है हमे उस समय का भी कोई अनुमान नहीं है की ये घाव कब भरेगा ? क्या हम उस समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं ???

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की दुहाई देते घूम रहे हम ...क्या ये नहीं जानते की इसपर भी हमला हो चुका है ? सब जानते हुए भी की भरम में हम जी रहे है ? हमारे द्वारा चुन कर भेजे गए जनप्रतिनिधि अब संसद पर बैठ कर ये तय करेंगे की किसकी सरकार को बचाए रखना है और किसे गिरना है ? किसको समर्थन देकर देश हित के नाम से ख़ुद को फ़ायदा पहुँचाना है ? धर्म के नाम पर वोट की राजनीती किस तरह करना है इसकी रणनीति तय की जानी है ? क्या संसद पर हमले के आरोपी को फँसी नहीं देना चाहिए ? क्या मेलगावं में हुए ब्लास्ट की निष्पक्ष जाँच नहीं होनी चाहिए ? धर्म के नाम पर वोटों के इस बटवारे की वजह से ही आज इस देश में ९/११ जैसी घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है ।हमारे देश में हो रहे आतंकी हमलों के पीछे सिर्फ़ एक ही मकसद है तबाही फैलाना ...लेकिन हमारे राजनीतिज्ञों का क्या मकसद है सब देखते हुए भी सिर्फ़ कुर्सी बचाना ???
अमेरिका में हुए हमले ९/११ के बाद से वहां कोई बड़ी घटनाएँ नहीं हुई इसका कारण है की वहां इस त्रासदी से निपटने के लिए पुरा देश एक साथ खड़ा हुआ और एक देश हमारा है जहाँ आए दिन ९/११ जैसी घटनाये हो रही है लेकिन हम बेबस और लाचार है हम सब कुछ देख रहे है लेकिन कुछ कर नहीं सकते ? इस देश में जब तक धर्म ने नाम पर लड़ना बंद नहीं होगा ,धर्म के नाम पर राजनीती चलती रहेगी , धर्म के नाम से लोगों को बाटा जाता रहेगा तब तक तब तक देश में अमन की कल्पना करना बेईमानी होगी आतंकवाद चाहे देश के बहार का हो या अन्दर का उसका मकसद साफ़ है देश की तबाही ... इस तबाही से देश को बचने के लिए देश के हर नागरिक को देश का सिपाही बनना ज़रूर है बस ज़रूरत है तो सिर्फ़ एक इमानदार कोशिश की ......

4 टिप्पणियाँ:

Anil Pusadkar on December 2, 2008 at 9:25 PM said...

सही कह रहे हो अनवर मियां।ज़रुरत है अब हर नागरिक के सिपाही बनने और ईमानदार कोशिश की।

Sanjeev on December 2, 2008 at 10:09 PM said...

हमें कहीं कहने या लिखने की जरूरत होनी ही नहीं चाहिये। देशप्रेम कोई दिखावे की चीज नहीं है। जरूरत तो इस मौके पर ईमानदार प्रयास की है। क्या हम यह कर पायेंगे?

डॉ .अनुराग on December 3, 2008 at 6:15 AM said...

तभी शायद इस वक़्त देश का हर नौजावान गुस्सा है ,क्रोधित भी.....वो सरकार से यही उम्मीद कर रहा है .शायद ये आक्रोश कुछ असर कर जाये

विक्रांत बेशर्मा on December 13, 2008 at 10:22 AM said...

अनवर भाई ,मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ , सही कहा आपने एक ईमानदार कोशिश की ज़रूरत है ,और फिर हालत ज़रूर बदलेंगे !!!!!!!

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