Saturday, August 16, 2008

देश की बदलती राजनीति की नई तस्वीर !!!



देश बदल रहा है , देश की राजनीति भी बदल रही है , कभी नेताओं की पहचान खादी से हुआ करती थी लेकिन अब स्वरुप बदलता जा रहा है , कभी नेता जनता की आवाज़ हुआ करता था अब भीड़ में एक चर्चित चहरा बन कर रह गया है , अब का नेता आदर्शों की बातें नहीं करता , वो दूसरो पर कीचड़ उछालता है !
जब से देश की राजनीति सत्ता मात्र की पहचान बनी है तब से राजनीति के मायने ही बदल गए है , अब सत्ता के लिए राजनितिक पार्टियों को किसी भी चीज़ से परहेज़ नहीं है ,पार्टियाँ कभी बाहुबल का सहारा लिया करती थी , अब बाहुबलियों के सहारे सरकार चलाती है , जो कभी अपराधी हुआ करते थे अब उन्हें सम्मानित कहा जाता है , सत्ता की लगाम उनके हाथों में है जो ख़ुद बे लगाम है , क्या देश का भविष्य इन बाहुबलियों के हाथ में है ?
ये तो उनकी बात हुई जो कभी हत्या , लुट , फिरौती , अपरहण , जैसे कारनामें करके राजनीति में आयें है अब ज़रा उनकी भी बात कर ली जाए जो एक रंगीन सपनो की दुनिया से हकीकत की ज़मीन उतरें है लेकिन मंजिल का उन्हें भी कोई अंदाजा नहीं है , ये हैं बॉलीवुड के वो सितारे जो सिनेमा के रंगीन पर्दे पर जनता को हसीन सपने दिखाते है , ये वो हसीन चहरा है जो पर्दे पर हर रोज़ बिकता है , अपनी अदाओं से दिल जीत लेते है , अपने हुस्न से दीवाना बना देते है , ये इनका पेशा है अपने पेशे में ये बखूबी से उतर जाते है , लेकिन क्या ये जनता के दर्द को समझ सकेंगे ? उनकी परेशानियों का एहसास है इनको ? कब तक ये जनता की आखों यूही धुल झोकते रहेंगे ???
पार्टियाँ चाहे जो भी हो , बॉलीवुड के सितारों की जमात हर जगह है , ये अपने फ़र्ज़ के साथ कितना इन्साफ करते है ये सभी जानते है ? चाहे बात धर्मेन्द्र की हो या गोविंदा की , या अन्य किसी अभिनेता से बने नेता की ...सभी की एक ही परेशानी है ...वक्त नहीं है ?
जनता ने इन्हे अपना प्रतिनिधि तो बना दिया लेकिन भूल गए की रंगीन सपने सिर्फ़ पर्दों पर ही अच्छे लगते है , इन जनप्रतिनिधियों को शायद ये भी ना पता हो के संसद निधि कहाँ पर खर्च की जाती है या की जाती भी है या नहीं ? जनता ने जब इनको संसद तक पंहुचा ही दिया है तो फ़िर वापस अपने छेत्र में क्यूँ देखना चाहती है ???
दक्षिण में फिल्मी कलाकारों को भगवान् की तरह पूजा जाता है जहाँ की राजनीति रंगीन पर्दे से हो कर गुज़रती है , जहाँ जो कलाकार की ज़ियादा फिल्में हिट है वो उतना बड़ा नेता बन जाता है , अब तो ये भी ख़बर मिल रही है की फिल्मों की दुनिया से निकल कर अपने राज्य जी जनता का दुःख दर्द बाटने के लिए चिरंजीवी भी एक पार्टी बनने जा रहे है , ये तो वक्त ही बताएगा की उनकी कितनी फिल्में हिट है ???
देश की राजनीति की इस नई तस्वीर में वो चहरे भी शामिल है जो यूवा है कुछ कर गुजरने की चाहत भी रखते है लेकिन संसद के शोर में उसकी आवाज़ कहीं दब कर रह जाती है ,
उनको सुनने ही ज़हमत कोई नहीं उठाना चाहता है , उनके विचार तो है लेकिन पार्टी की गाइड लाइन से भटकने का अंजाम भी वो जानते है ???
इन सब के बीच सभी पार्टियाँ अपनी अपनी गिनती बढाने में लगी हुई है , उन्हें इससे मतलब नहीं है के जीतने वाला कौन है बस गिनती बढ़ना चाहिए , क्या पता कब विस्वास मत के लिए उनकी ज़रूरत पड़ जाए ? जनता तो बेचारी मासूम है किसी के भी बहकावे में आ जाती है , चिकना चहरा , एक दो फिल्मी डायलाग , और क्या वोट तुम्हारा ???
आज ये सोचने की ज़रूरत है की आधी बोतल शराब से या फ़िर के कुल्हे मटकाते किसी कलाकार के हाथों में क्या हम देश की बाग़ दौड़ सौपने जा रहे है ? क्या इस देश की कमान उनके हाथों में होंगी जिनके ख़ुद के हाथ खून से रंगे हुए है ? क्या यही लोकतंत्र है ? अगर हाँ ... तो तमाशा देखते देखते हम ख़ुद एक दिन तमाशा बन जायेंगे और लोकतंत्र की हत्या और बलात्कार होते देखने में ज़ियादा वक्त नहीं लगेगा ???

6 टिप्पणियाँ:

Anil Pusadkar on August 16, 2008 at 9:32 PM said...

badhiya hai

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन on August 17, 2008 at 5:54 AM said...

अनवर,
तुम्हारी बात बिल्कुल सही है. लोकतंत्र की हत्या तो हो ही रही है किसी न किसी रूप में - विशेषकर देश की सबसे गरीब जनता का जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित रह जाना ही एक बड़ा अन्याय है.
कहीं न कहीं हमें अपने अन्दर इस कमी की जिम्मेदारी लेने की आदत डालनी होगी ताकि हम भी इसे दूर करने का अस्त्र बन सकें. अच्छे लोगों को ज़मीनी हकीकत से जुड़ने की और ज्यादा मेहनत करने की ज़रूरत है.
१. हर पढालिखा अपने जीवनकाल में सिर्फ़ एक अनपढ़ को पढा दे उतना भी एक बड़ी देशसेवा है.
२. हर इंसान अपने जीवनकाल में सिर्फ़ एक रिश्वतखोर को पकड़वा दे तो एक पीढी के सामने ही करप्शन का खत्म समझो.
३. एक फीसदी लोग भी नफरत भुलाकर विधर्मी या विजातीय व्यक्ति से विवाह कर लें तो दंगे भूत हो जाएँ.
४. मैं, मेरा परिवार, मेरा धर्म, मेरी भाषा, मेरा प्रदेश से ऊपर उठना पडेगा - लोग बचेंगे तभी लोकतंत्र बचेगा.

शुभकामनाएं.

सतीश सक्सेना on August 17, 2008 at 8:51 AM said...

अनवर भाई !
आजादी के लिए धन्यवाद के लिए आभारी हूँ, मगर मज़ा तो तब आएगा जब....

मुक्त हवा में, साँस ले सकें ,हर दिल को आराम दे सकें
मन्दिर , मस्जिद हँसे साथ मिल, तब माने आजादी है,

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari on August 17, 2008 at 9:43 AM said...

अनवर भाई इस सार्थक आलेख के लिए आपका आभार ।

राज भाटिय़ा on August 17, 2008 at 12:37 PM said...

भाई आप का लेख बहुत ही आंखे खोलने वाला हे, इस देश के लोग जो थोडा भी दिमाग रखते हे सभी दुखी हे ऎसी राजनीति से, ओर इन अभिनेताओ को महान कहने से,ओर बेबकुफ़ लोग तो इन की पुजा भी करते हे भगवान की तरह से क्यो ? इस सवाल को जबाब उन के पास खुद भी नही हे,जयाललिता के खानदान का क्या सब को नही पता, फ़िर भी उसे पुजा जाता हे, यह सब क्या हे एक बेबकुफ़ी नही तो.. ऎसे ही लोगो ने पुरे देश का सत्यनाश कर रखा हे,
आप का धन्यवाद

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari on August 17, 2008 at 8:30 PM said...

अनवर भाई, नारमल ब्‍लाग फीड में आपका ताजा पोस्‍ट नजर नहीं आ रहा हैं, कृपया
लागइन - डेशबोर्ड - सेटिंग - साईड फीड - ब्लॉग फ़ीड्स को अनुमति दें : पूरा करें !

 

Copyright 2008 All Rights Reserved | Revolution church Blogger Template by techknowl | Original Wordpress theme byBrian Gardner